समीक्षात्मक आलेख

फ़िल्म ‘कोशिश’ : गुलज़ार (1972) श्री अजय चंन्द्रवंशी सहा.वि. शिक्षा अधिकारी,साहित्यकार कवर्धा छ.ग.

साहित्यकार परिचय- श्री अजय चंन्द्रवंशी

माता-पिता –

जन्म – 18 मार्च 1978

शिक्षा- एम.ए. हिंदी

प्रकाशन –(1) ग़ज़ल संग्रह भूखऔर प्रेम (2011)

(2) ज़िंदगी आबाद रहेगी कविता संग्रह(2022)

विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कविता, ग़ज़ल, फ़िल्म समीक्षा, इतिहास और आलोचनात्मक आलेख प्रकाशित

सम्मान – (1)छत्तीसगढ़ प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन का राजनारायण मिश्र पुनर्नवा पुरस्कार(2019) से सम्मानित

(2)छत्तीसगढ़ी साहित्य महोत्सव रायपुर द्वारा हरेली युवा सम्मान 2021

सम्प्रति – सहायक विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी, कवर्धा

सम्पर्क –राजा फुलवारी चौक, वार्ड न. 10, कवर्धा जिला- कबीरधाम, छ.ग.,पिन- 491995
मो.  9893728320

 

फ़िल्म ‘कोशिश’ : गुलज़ार (1972)
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शारीरिक ‘अक्षमता’ के साथ जीवन जीना चुनौतीपूर्ण होता है। कदम-कदम पर कठिनाइयां आती हैं।अक्षमता का अनुपात जितना अधिक होता है परनिर्भरता की सम्भावना उतनी ही अधिक होती है।ऐसे में व्यक्ति हताश भी हो सकता है,और उसे जीवन बोझ लग सकता है।

 

मगर जीवन का आकर्षण भी अदम्य है।होना भी चाहिए।
व्यक्ति जीना चाहता है और इस कार्य में उसके सामाजिक परिवेश की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।यदि घर-परिवार और परिवेश से अपेक्षित सहयोग मिले तो ऐसे व्यक्ति को सामान्य जीवन जीने में आसानी होती है; मगर दुर्भाग्य से शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों के मामले में ऐसे उदाहरण कम मिलते रहे हैं।

 

माता-पिता अवश्य अपनी सन्तान की क्षमता भर मदद करते हैं, मगर एक दिन उन्हें अपना जीवन जीना ही होता है,ऐसे में यदि उनका लालन-पालन आत्मनिर्भरता की दिशा में न हो तो मुश्किलें और बढ़ जाती हैं।

 

फ़िल्म ‘कोशिश’ में दो मूक-बधिर व्यक्ति ‘आरती‘ और ‘हरिचरन‘ के माध्यम से ऐसे व्यक्तियों की जिजीविषा,सामान्य जीवन जीने की क्षमता और ललक तथा मानवीय संवेदना के कई पहलुओं उकेरा गया है। दोनो बोल-सुन नहीं सकते मगर महसूस कर सकते हैं।

 

संवेदना और मानवीयता से भरा उनका जीवन जैसे एक-दूसरे की बाट जोह रहा था। दोनो मिलकर सामान्य पारिवारिक जीवन जीने की शुरुआत करते हैं।दोनो सामान्य घर से हैं इसलिए आर्थिक अभाव कोई बड़ी समस्या नहीं है। मगर समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं रही है जो अपनी अकर्मण्यता और संवेदनहीनता के कारण दूसरों को परेशान करते रहते हैं।फ़िल्म में आरती का भाई ‘कानू’ ऐसा ही चरित्र है।कुछ अन्य भी समय-बेसमय उनकी ‘कमियों’ का मजाक उड़ाते रहते हैं।

 

आरती और हरिचरन को एक बेटा होता है।उनके जीवन में जैसे बहार आ जाती है।मगर विडम्बना पीछा नहीं छोड़ती। पहले वे बच्चे के रोने को सुन न पाने के कारण उसके भी मूक-बधिर होने की आशंका से ग्रस्त हो जाते हैं, लेकिन डॉक्टर के आने से स्थिति स्पष्ट हो जाती है।कुछ दिन बाद तेज बारिश की रात में बच्चा रोते रहता है और वे सुन नहीं सकते ,ऐसे में आरती का भाई ‘कानू’ घर मे पैसे चोरी करने आता है और बच्चे को बिस्तर से नीचे ज़मीन पर उतार देता है।अंततः अबोध बच्चा रोते अपने खिलौने का पीछा करते ऊँचाई से गिर जाता है और सब कुछ ख़त्म हो जाता है।

 

आरती-हरिचरन के जीवन पर जैसे वज्रपात हो जाता है, मगर अंततः वे फिर नये सिरे से जीवन जीने की कोशिश करते हैं। आगे फिर उनका एक और बेटा ‘अमित’ होता है।इस बार वे अंधत्व से पीड़ित एक जरूरतमंद व्यक्ति ‘नारायण’ को अपने साथ रखते हैं ताकि वह बच्चे की आवाज़ को सुन सके। इस तह दो देख सकने वाले और एक सुन सकने वाले व्यक्ति के सहयोग से ज़िंदगी पटरी पर आ जाती है और बच्चे का लालन पालन सहज ढंग से चलने लगता है।इधर हरिचरन अपनी मेहनत से अपने काम मे तरक्की करते जाता है।

 

यहां आकर फ़िल्म ख़त्म हो सकती थी मगर निर्देशक ने इसका जिस ढंग से क्लाइमेक्स रचा है वह फ़िल्म को एक ऊँचाई देता है।अमित के युवा होते-होते आरती का निधन हो जाता है।आख़िरी के कुछ वर्षों में हरिचरन ही उसका मार्गदर्शन करता है। बेटा पढ़-लिख कर काबिल हो रहा है, संवेदनशील है,माता-पिता के संघर्ष को समझता है।

 

हरिचरन जिस कंपनी में काम करता है उसके मालिक की एक बेटी है,जो मूक-बधिर है। वह और उसकी पत्नी अपनी इस पुत्री का विवाह हरिचरन के बेटे अमित के साथ करना चाहते हैं।इसके लिए उन्होंने हरिचरन पर कभी अपने ‘प्रभाव’ का प्रयोग नहीं किया।बल्कि कुछ संकोच से ही हरिचरन को घर बुलाकर प्रस्ताव रखते हैं।मन मे संकोच भी है कि कहीं हरिचरन इंकार न कर दे।

 

हरिचरन को कन्या की स्थिति के बारे मालूम ही नहीं था।जब उसे उसके मूक-बधिर होने का पता चलता है तो वह और भी द्रवित होकर उसे आशीष देता है।

 

संयोग से अमित भी साथ था।जब उसकी राय पूछी जाती है तो आशा के विपरीत वह मूक-बधिर से विवाह करने से इंकार कर देता है।पिता हतप्रभ!सारा जीवन संघर्ष,सारे संस्कार,सदिच्छाएँ जैसे एक पल में ध्वस्त हो जाती हैं! क्रोध और हताशा में जैसे उसे समझ नहीं आता क्या करे।

 

घर जाकर वह क्रोध और ग्लानि में अमित को घर से बाहर जाने को कहता है। उसकी डिग्रियों और किताबों को पटकता है और जताता है कि यह सब व्यर्थ गया जब तुम्हारा अन्तस् ही संवेदनशील नहीं बना।इसी समय नारायण आकर अमित को सम्हालता है और अन्ततः उसमे भी परिवर्तन दिखाई देता है। पिता-पुत्र संवेदना से भीग जाते हैं, और फ़िल्म समाप्त हो जाती है।

 

यहाँ यह बात सोची जा सकती है कि अमित का भी तो अपना जीवन है जिसका फैसला वह ख़ुद ले सकता है।यदि वह मूक-बधिर लड़की से विवाह नहीं करना चाहता तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता!यह बात सही हो सकती थी मगर जिस माहौल और जिस तरह से उसका लालन-पालन हुआ है उसमे ऐसी लड़की के साथ सामंजस्य बेहतर हो सकता था क्योंकि बचपन से उसने अपने माता-पिता का परस्पर और ख़ुद उसके साथ संवाद को देखा-समझा है।

 

फिर जिस असंवेदनशीलता से उसके माता-पिता जीवन भर संघर्ष करते रहे हैं, उसी का पुत्र में होना गहरी विडम्बना का बोध कराती है।कुल मिलाकर अमित का विवाह ‘कुर्बानी‘ अथवा ‘दया’ न होकर सहज दाम्पत्य हो सकता था। फिर अमित के इंकार का सिर्फ यही कारण दिखाई पड़ता है।

 

इस तरह फ़िल्म में सुखद अंत का संकेत है। मगर इस फ़िल्म की महत्ता इसके पात्रों के सहज जीवन जीने की कोशिश और संवेदनशीलता की पक्षधरता में ही है।फ़िल्म में संजीव कुमार और जया बच्चन का अभिनय बेजोड़ है जिसे उचित ही याद किया जाता है।

 

 

फोटो साभार- गुगल

 

 

 

 

 

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