
साहित्यकार परिचय – विजय वर्धन
माता-पिता –स्वर्गीया सरोजिनी देवी, स्वर्गीय हरिनंदन प्रसाद
पत्नी – श्रीमती स्तुति रानी
जन्म – 10 .10. 1954
शिक्षा –बी .एस .सी .ऑनर्स, एम. एस. सी, बी. एड.
प्रकाशन – दो पुस्तकें प्रकाशित
1. मेरा भारत कहां खो गया
2. हमारा प्यारा भागलपुर
सम्मान- विभिन्न संस्थाओं से सम्मानित
संप्रति -भारतीय स्टेट बैंक से अवकाश प्राप्त
सम्पर्क – लहेरीटोला,भागलपुर,बिहार मोबाइल -9204564272
”संस्कारित बहू”
रामानुजम बाबू एक आफिस में बड़ा बाबू के पद पर काम करते थे। उनकी पत्नी एक कुशल गृहणी एवं मृदुभाषिणी थीं। रामानुजम बाबू के दो पुत्र हूएहर्षित और मोहित। अपने सामर्थ्य से बाहर रामानुजम बाबू ने दोनों पुत्रों को उच्च शिक्षा दी जिससे उनके दोनों पुत्र कलेज में प्रोफेसर हो गये।
हर्षित ने अपनी सहपाठिनी पुष्पीता के संग विवाह रचा लिया जबकि मोहित का विवाह स्वजाति में ही माता पिता ने धूम-धाम से सम्पन्न कराया। कालांतर में हर्षित पुत्र अंकुर का पिता बना और मोहित अंकित का। समय गुजरता गया। एक दिन रामानुजम बाबू रिटायर हो कर घर में आराम करने लगे स उनकी पत्नी सावित्री देवी की भी काया क्षीण हो चली थी।
बड़ी बहू पुष्पीता घर का काम काज तो करती थी पर सास ससुर की सेवा से दूर ही रहती थी। उसे बस अपने पुत्र एवं पति की ही चिंता हरदम रहती थी। वह थी तो पढ़ी लिखी पर थी एक साधारन परिवार की नारी। इसलिए उसका सोच निम्न श्रेणि का था। परिवार में सुख शांति को बनाये रखने के लिए कोई उसे कुछ नहीं कहता था। दूसरी ओर मोहित की पत्नी कुमुदिनी बड़े नेक स्वभाव की थी और दिल से अपने सास ससुर की सेवा किया करती थी।
करती भी क्यों नहीं! क्योंकि वह शहर के एक प्रतिष्ठित डाकटर की बेटी थीं। संस्कार मानो उसके रग-रग में समाया हुआ था। घर में जो भी मेहमान आते वे कुमुदिनी से ही बात करना पसंद करते थे। कुमुदिनी भी मेहमानों का तहे दिल से स्वागत करती थी। हर्षित का पुत्र अंकुर पढ़ने में मन नहीं लगाता था, इसलिए वह कई बार फेल होता गया। वह मोहित के पुत्र अंकित से भी नीचे क्लास का विद्यार्थी हो गया जबकि वह अंकित से उम्र में बड़ा था।
अंकित हर क्लास में प्रथम आता। मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में वह प्रथम प्रयास में ही सफल हो गया। एक अच्छे मेडिकल कालेज में उसका नामांकन हो गया। अंकुर ने किसी प्रकार से ग्रेजुएशन किया और एक प्राइवेट कंपनी में काम करने लगा। नकारात्मक सोच के कारण पुष्पीता उदास रहने लगी। वह सोचती कि मेरे स्वार्थपरता के कारण ही मेरे पुत्र ने कोई अच्छी नौकरी नहीं की जिससे मैं आहत हूँ।
कुमुदिनी ने न तो पुष्पीता की कभी अवहेलना की बल्कि उसके दंश को सदा झेला। अंकुर जब डाकटर बन गया तब उसने अपनी ताई पुष्पीता के बीमार पड़ने पर खूब सेवा करता और चंद दिनों में ही उन्हें चंगा कर देता। पुष्पीता की आंखें सदा शर्म से झुकी रहने लगी।


















