‘छत्तीसगढ में पाणिग्रहण संस्कार होते देखना अद्भुत अहसास’ मनोज जायसवाल संपादक सशक्त हस्ताक्षर कांकेर (छ.ग.)

श्री मनोज जायसवाल
पिता-श्री अभय राम जायसवाल
माता-स्व.श्रीमती वीणा जायसवाल
जीवन संगिनी– श्रीमती धनेश्वरी जायसवाल
सन्तति- पुत्र 1. डीकेश जायसवाल 2. फलक जायसवाल
(साहित्य कला संगीत जगत को समर्पित)

– छत्तीसगढ़ के कई सांस्कृतिक मंचों पर पारंपरिक गीतों की प्रस्तुति
कोन टीके नोनी, अचहर पचहर, कोन तोरे टीके हे लुगाय हो…. कोन तोर चघावय नोनी एक तेल हरदी एक तेल हरदी बने, कोन तोर दुई तेल चघाय कि पींवरी लगाय कोन मुड अंचरा धरे…. इस वक्त आप यदि छत्तीसगढ़ में गुजर रहे हों तो हो रही शादियों में ये गीत आपके कानों तक झंकृत कर यहां की संस्कृति एवं परंपरा में खो जाने काफी होंगे।
छत्तीसगढ़ में शादी समारोह का क्या कहना। यह वही भारत देश जिसे भारत माता कहा जाता है,इसी के एक प्रदेश छत्तीसगढ़ जिसे छत्तीसगढ़ महतारी से संबोधित करते नवाजा गया है। हर त्यौहारों पर छत्तीसगढ़ी लोक गीतों के माध्यम से रस्मोपरंपराएं निभायी जाती है। इन रस्मोपरंपराओं में महिला वर्ग के बीच कई प्रकार के संस्कार पूरे विधि विधान से किए जाते हैं। युं तो छत्तीसगढ़ में हर उत्सव का अलग ही आनंद है,लेकिन जीवन के महती विवाह संस्कार का अपना अलग ही स्थान है।
यही कारण है कि न देश के अपितु विदेशी सैलानी भी यहां आते हैं तो यहां के विवाह परंपराओं के बीच खो जाते हैं। लोगों को मंगरोहन के साथ ही मुख्य रूप से जिस पाणिग्रहण संस्कार को होते देखना अद्भुत एहसास कराता है। किस प्रकार पारंपरिक मधुर गीतों के माध्यम से ये रस्म निभाये जाते हैं।
यही कारण है कि कभी दूरस्थ लोग यदि गावों में हों,जो आमंत्रित भी न हों वे भी छत्तीसगढ़ की शादियों में होने वाली पाणिग्रहण संस्कार का दर्शन करना शुभ मानते हैं। किस प्रकार स्नेह वात्सल्य के साथ छत्तीसगढ़ की मीठी-मीठी गंध के साथ आज यहां विवाह उत्सव में निभाये जाने वाले संस्कार पारंपरिक वाद्व यंत्रों के साथ ही अत्याधुनिक वाद्व यंत्रों से सुरीली धुन से संगीत और भी लोक जीवन को मजबूत बनाते हैं,यह न सिर्फ बस्तर अपितु यदि आप अन्य प्रदेशों से आते हैं,तो निश्चित ही यहां होने वाली विवाह उत्सव का दर्शन करें।
छत्तीसगढ़ में अमूमन रूप से शादियों गर्मी के दिनों में होती है,जहां दिन बड़े होते हैं,जिससे कि पारंपरिक संस्कार निभाने पर्याप्त समय मिलता है। विवाह उत्सव में बजने वाली गीतों संगीत में छाया चन्द्राकर,ममता चंद्राकर,अलका चंद्राकर सहित कई और नाम है,जिन्होंने पारंपरिक लोक गीतों के माध्यम से इसे ऊंचाईयों पर पहूंचाया है। अन्य प्रदेशों के लोगों को भी यहां की परंपराओं की छाया दिखे इसे साम्य रख कई सांस्कृतिक आयोजनों में जो दूसरे प्रदेशों में आयोजित हो रहे हैं,इसकी प्राथमिकता के साथ प्रस्तुती भी दी जा रही है,जिसका बेहतर प्रतिसाद मिलता है और यहां के पारंपरिक गीतों की डिमांड होती है।



















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