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”अरौद दशहरा पर चंद्रयान माडल का प्रदर्शन” श्री मनोज जायसवाल संपादक सशक्त हस्ताक्षर कांकेर (छ.ग.)

(मनोज जायसवाल)
कांकेर(सशक्त हस्ताक्षर)। अपने 84 साल स्वर्णिम अतीत को समेटे छत्तीसगढ के कांकेर जिलांतर्गत चारामा विकासखंड के सबसे जागरूक कहे जाने वाले गांव अरौद का दशहरा पर्व अपनी परंपरा मुताबिक एक दिन बाद यानि ग्यारहवीं तिथि अनुसार 25 अक्टूबर  बुधवार को मनाया जा रहा है। इस वर्ष चंद्रयान भी मुख्य आकर्षक का केंद्र बनेगा।

चंद्रयान माडल खींचेगा ध्यान
ऐतिहासिक अरौद दशहरा उत्सव में प्रमुख आकर्षक केंद्र तो लगातार यहां इलेक्ट्रानिक पद्वति से किया जाने वाला रावण दहन होता है,जिसे देखने छत्तीसगढ़ के दूर-दूर से लोग आते हैं। इसके अतिरिक्त यहां की आतिशबाजी के साथ ही एक और मुख्य आकर्षक होता है,राष्ट्रीय स्तर पर देशहित मे राष्ट्र प्रेम को जाहिर करते किसी माडल का प्रदर्शन। इसी तारतम्य इस वर्ष चंद्रयान का माडल बनाया जा रहा है। इसकी खासियत होगी कि रस्सी के सहारे यह तकरीबन 20 फीट आसमान में उड़ेगी और वहां पटाखों के माध्यम धुंआ नीचे छोड़ेगी और तिरंगा लहरायेगी। जिसके साक्षी बनेंगे प्रदेशवासी। इस बार चुनाव के चलते शांति व्यवस्था बनी रहे जिसका ग्रामवासी ध्यान रख रहे हैं।

सारे संसाधन गांव का
अल्प खर्चों पर पुर्णतः कई जुगाड़ के साथ 50 फीट रावण को बनाने के लिए कभी कोई बाहर से किसी तकनीकी जानकार को नहीं बुलाया जाता। सारे संसाधन गांव के और इसको मुर्तरूप देने में गांव के युवा प्रमुख जो पिछले एक महीने से इस कार्य में लगे होते हैं। गांव के प्रतिभाओं की एकता का ही परिणाम कि वर्तमान में यह प्रदर्शन दशहरा मैदान में कई हजारों की भीड में निर्विघ्न संपन्न होता आ रहा है। रात्रि मे ंसांस्कृतिक आयोजन होने से यह उत्सव का आनंद दोगुना होता है। यहां दशहरा उत्सव में जितनी भीड होती है,यहां के वार्षिक मेले में नहीं होता।

आ चुके हैं प्रदेश के मुखिया
पिछले वर्ष 2018 के चुनाव पुर्व जब दशहरा उत्सव का आयोजन था,तब पूर्व विधायक रहे स्व. मनोज मंडावी के बुलावे पर तात्कालीन प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे भुपेश बघेल को इस उत्सव के लिए आमंत्रित किया गया था। इस उत्सव में उनका आना हुआ इससे वे इतना खुश हुए कि दोबारा अरौद आने की बात कही। अरौद के प्रति उनका प्रेम बना कि किसी भी आयोजन में अरौद वाले औपचारिक भेंट के नाम आने की खबर मिलने पर खुश होते स्वीकृति देते। अरौद का नाम आज भी उन्हें बखुबी याद होता है।

साथ ही प्रति वर्ष अरौद ऐतिहासिक दशहरा उत्सव पर कई अतिथि आनंद लेने के बहाने सहर्ष अपनी स्वीकृति देते रहे हैं। छत्तीसगढ़ के दुरस्थ लोग जो इस गांव में अतिथि के रूप में आते हैं,उनका कहना होता है कि अरौद गांव उन्हें अपने मातृभुमि गांव जैसा लगता है।

सुरक्षा व्यवस्था,चाक चौबंद
ऐतिहासिक दशहरा उत्सव में अभी तक कभी तनाव की स्थिति नहीं बनी। इसका कारण गांव के लोगों की अपनी व्यवस्था तो है, इसके साथ बेहतर तगडी पुलिस व्यवस्था भी शांति व्यवस्था के लिए होना है।

गांव के सभी कलाकार
अरौद दशहरा में पूरा संसाधन गांव का इस्तेमाल होता है,तारतम्य इस उत्सव में भाग लेने वाले सभी कलाकार भी गांव के होते हैं।, इतना ही नहीं प्रति वर्ष नये लोगों को भुमिका निभाने का अवसर दिया जाता है। कुल मिलाकर कला संगीत के प्रति स्नेहिल लगाव के लिए भी युवाओं को प्रोत्साहित किया जाता है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ की सभी पर्व उत्सवों में सभी विधाओं में वाद्य यंत्र बजाने वाले कलाकार,गायक,गायिका,अभिनय करने वाले कलाकारों के लिए खान है यह अरौद गांव।

साफ-सफाई का ख्याल
अरौद दशहरा पूर्व गांव में स्वच्छता का पुरा ध्यान रखा जाता है। गलियों में उगी घांस-फुंस की सफाई की जाती है। इसके साथ ही दशहरा उत्सव पर गांव को पुरी तरह दुल्हनों की तरह सजाया जाता है। निजी रूप से आगंतुक अतिथियों के आगमन पर स्वागत के बैनर लगाये देखे जा सकते हैं।

कई मामलों में अग्रणी है-अरौद
अरौद एक प्रतिभाशाली गांव है,जहां न कला संगीत ही अपितु सामाजिक,साहित्यिक पत्रकारिता के साथ ही प्रशासनिक पदों पर यहां के माटी पुत्र आज महत्वपुर्ण पदों पर सेवा दे रहे हैं। खेती किसानी के मामले में यह अग्रणी है। अथाह वन संपनाओं को समेटे अरौद के सागौन का जंगल किसी पहचान का मोहताज नहीं है। नये सिरे से पुनः सागौन,आंवला एवं मिश्रित प्रजाति के पौधों के प्लांटेशन में भी इसकी चर्चा माडल के रूप में गिनी जा रही है। पूर्व में महानदी पर पुल नहीं होने और पिछडेपन का अरौद आज नहीं रहा।

वन्य पशुओं का संरक्षण
गांव से लगे इसी सागौन प्लांटेशन क्षेत्र की पहाडियों पर भालुओं का बसेरा है,जहां ये जीव गांव तक आते रहते हैं,अभी तक कोई हमले जैसी घटना नहीं हुई है। अब नेवला का रहवास क्षेत्र भी बन गया है,जिसके संरक्षण के लिए भी गांव में कड़ा रूख अपनाया गया है कि कोई भी जीव जंतुओं को हानि ना पहुंचाये।

 

 

 

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