जीवन : अलिखित उद्देश्य श्रीमती रीना रिद्धिमा मौर्य शिक्षिका साहित्यकार कांकेर छत्तीसगढ

साहित्यकार परिचय
– श्रीमती रीना मौर्य (Rini)
माता–पिता – श्री आर आर पटेल श्रीमती कृष्ण पटेल।
पति– श्री धीरेन्द्र सिंह मौर्य। पुत्री– रिद्विमा मौर्य
जन्म– 3 जनवरी कांकेर
शिक्षा– M.Sc., B.Ed.
प्रकाशन– कविताओं का संग्रह –
1. ऐ स्त्री तुम कल फिर आना
2. बेटी हो मेरी तुम
3. कल्पनाओं की दुनियाँ
4. चाहिए मुझे आज़ादी
5. बचपन के लम्हे
6. ज़िन्दगी की आपा धापी
7. बनना चाहती हूँ प्रकृति सी
8. गाँधी -आज़ादी के करतार
9. कश्मकश भरी है ज़िन्दगी
10. शास्वत सरिता
11. तेरे ख्यालों में
12. अच्छे का फल
13. पुष्प की प्रकृति
14. वन्य जीव -एक निर्दोष आत्मा की अनकही आवाज़
15. बिटिया रानी तुमने मुझे आसमान छुआ दिया
गद्य – “श्री कृष्ण “- एक व्यक्तित्व नहीं एक वाद
पुरस्कार⁄सम्मान–
सम्प्रति – व्याख्याता (जीवविज्ञान ) शा. उ. मा. विद्यालय, सिंगार भाट जिला -कांकेर
छत्तीसगढ़
सम्पर्क – ट्राइबल कालोनी‚ न्यू बस स्टैंड अघन नगर कांकेर मो 9406481164

“जीवन : अलिखित उद्देश्य”
मैंने नवरात्रि के पावन क्षणो मे एक दिन पूरी शिद्दत के साथ, एकाग्र होकर, बिना इधर उधर की बातों मे ध्यान लगाए, बड़े ही समर्पित भाव से माँ दुर्गा के शक्ति स्वरुप का चित्रण कैनवाश पर उकेरा,जो देखने मे बड़ा ही सुन्दर और जीवंत प्रतीत हो रहा था.मेरी नज़र मेरे ख़ुद बनाये उस चित्र से हट नहीं रही थी, शायद वो मेरी बनाई अब तक की सभी चित्रों मे सबसे साफ, सुन्दर और अदभुत थी, मैं मन ही मन बड़ी ख़ुश हुई और सोचने लग गई की आखिर मेरे जैसे एक अल्हड़ और कम जानकार व्यक्ति, जिसे पेंटिंग की ख़ास परख नहीं है।
बस कभी कभी शौकिया तौर पे बना लेने वाली लड़की से इतनी सुन्दर और जीवंत चित्र आखिर बन कैसे गया, वो भी बिना बिगड़े, कम समय मे, शायद ये मेरे लिए उस वक्त का एक विचारणीय विषय था, फिर मुझे ये अहसास हुआ की इन सबके पीछे मेरा एकाग्र समर्पण था, मैं जब माँ दुर्गा का स्वरुप बनाने बैठी तो मन को मलिनता से दूर रखा, सारे ईर्ष्या, द्वेष को एक किनारे कर दिया, नकारात्मक प्रतीत होने वाले लोगों को मन के द्वार मे अंदर घुसने नहीं दिया, अपनी सारी इन्द्रियों को समेट कर सभी के आपसी समन्वय के साथ एकाग्र चित्त होकर अपने कला उद्देश्य को आकार देने मे जुट गई जिसका सुन्दर परिणाम मुझे सबके लाइक और शब्दों के जरिये मिल गए।
आज सुबह मैं जब अपने आँगन मे बैठ कर चाय की चुस्कीयों के साथ प्रकृति की स्वच्छ छवि का आनंद ले रही थी और पक्षियों के मधुर आवाज़ कानों मे सुन्दर रस घोल रहे थे तभी अचानक मेरे मन मे एक बात आई की जब एकाग्रता, निश्छलता और समर्पित भाव से मैंने माँ दुर्गा के भावों को चित्र के रूप मे बड़े सुन्दर तरीके से एक कोरे कागज़ पर उकेरा तो कितनी भावपूर्ण आकृति बन गई, तो हमारा जीवन भी तो एक प्रोजेक्ट की भांति है जिसका मूल उद्देश्य मात्र जीवन को जीना नहीं है अपितु इसे सुन्दर और सरल बनाना प्राथमिकता है और जिसे बनाना स्वयं के हाथ मे है न की दूसरे के,और इस जीवन मे सुंदरता और सहजता तभी है जब इसे हम निश्छल मन, आपसी समन्वय, बिना ईर्ष्या द्वेष और समर्पित भाव से जीये और जीने दे


















