मन है धरातल
दिल भावनाओं का समन्दर,
उमड़ रहा हर पल
स्मृतियों का बवण्डर।
हर लम्हा दिल पुकारे
रो पड़े मन,
सूना-सूना घर आँगन
तड़प उठे जन-मन।
दूर होकर भी
आसपास ही होते हम,
हर साँसों में
आहट तुम्हारी पाते हम।
रात के एक बज रहे हैं। दुनिया सो रही है शायद, लेकिन मेरी आँखों से नींद कोसों दूर है। मुझे माँ की बहुत याद आ रही है। इसमें कोई दो मत नहीं कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सबसे प्यारी, पूजनीय और अनमोल इंसान ‘माँ’ ही होती है। माँ उस व्यक्तित्व का नाम है, जिनके लिए सब कुछ उनकी सन्तान होती है। माता-पिता के प्यार की जगह कोई नहीं ले सकता। माँ ही प्रथम गुरु है, वही शुरू है। ईश्वर सब जगह उपस्थित नहीं रह सकता, इसलिए माँ के रूप में अपनी सत्ता को कायम रखा है। माँ ही सैकड़ों ताले की मास्टर चाबी है।
समूचे रिश्तों में सबसे छोटा सम्बोधन
जिस पर समाहित विशाल और विराट,
जीवन का होता जो सबसे कीमती साथ।
हमारी ममतामयी माँ अब नहीं रही। लेकिन यह मानने को दिल तैयार नहीं हो रहा है। दीपोत्सव में 10 से 12 नवम्बर 23 को मस्तूरी आने पर हमारे घर मातृछाया में माँ के साथ लगभग 15 घण्टे तक समय बिताया। साथ में हमने ढेर सारी मिठाइयाँ खाई। लगभग 77 वसन्त पूरा कर लेने के बाद भी माँ स्वस्थ रही। उन्हें कोई बीमारी न थी। नित्य क्रिया कर्म के अलावा अच्छे से हलचल कर लेती थी। सीढ़ियाँ उतर-चढ़ लेती थी। हर रोज मौन रहकर सतगुरु का ध्यान करती थी।
माँ केवल साक्षर थी, लेकिन उनमें गहरी समझ थी। किसान परिवार की बेटी और बहू होने के बावजूद उनका पारिवारिक प्रबन्धन काबिले तारीफ था। पिताजी के परिश्रम की पाई-पाई का सदुपयोग सुनिश्चित की, कभी व्यर्थ जाने ना दी। यही वजह है कि मध्यवर्गीय कृषक परिवार के होने पर भी अभावों से कभी पाला न पड़ा। जीवन की गाड़ी सुचारू रूप से चलती रही। हमारी शिक्षा-दीक्षा में कोई कमी ना हुई। मैं सबसे बड़ा पुत्र था। हम लोग पाँच भाई हैं। मेरे अलावा लक्ष्मीकांत, मनोज, सुरजीत और चन्द्रहास। मेरे बाद वाला भाई लक्ष्मीकांत मुझसे लगभग पाँच वर्ष छोटा है। मुझे बचपन से ही अत्यधिक लाड़-प्यार मिला। ईश्वर ने मुझे प्रखर बुद्धि दी। मुझे 3 वर्ष के बाद की घटनाएँ याद है।
बचपन में मैं जिद्दी था। ऐसा शायद ज्यादा लाड़-प्यार की वजह से था। मेरे जिद्दीपन और शरारत से परेशान होकर माँ कभी-कभी मुझे पीट देती थी तो मैं रूठ करके घर के पीछे कोठार तरफ जाकर छुप जाता था, कभी पैरावट की ओट में छुपकर बैठ जाता था। तब माँ बहुत परेशान और दुःखी हो जाती थी। वह मुझे खोजने लगती थी। आकाश-पाताल एक कर डालती थी। जब मैं बहुत बड़ा कोठार में अकेला बैठा मिलता था तो झटपट गोदी में उठाकर घर ले आती थी और खुद रोने लगती थी। मैं कभी रूठ कर कपड़ों को फाड़ देता था तो कभी खिलौने को तोड़ देता था। लेकिन मेरी ये आदत ज्यादा दिन ना रही। मुझे खुद ऐसा लगा कि मैं गलत कर रहा हूँ। सच में जब पागल इंसान यह जान लेता है कि वह पागल है, तब वह समझदारी के करीब होता है।
कहते हैं 60 से 70 की अवधि में मस्तूरी की कृष्ण लीला-मण्डली की धाक थी। कइयों गाँवों में मंचन हो चुका था। उसके बाद लगभग मृतप्राय हो गई थी। जब मैं सातवीं पढ़ रहा था, उस दौर में लीला मंडली को पुनर्जीवित करने के प्रयास प्रारम्भ हुए। मुझे कृष्ण की भूमिका के लिए चयनित किया गया। एक सप्ताह में सारा पाठ याद कर लिया। इसी चक्कर में एक दिन स्कूल जाने में लगभग एक घण्टा देर हो गई। तब मेरी माँ बहुत गुस्साई और समझाई- “बेटा, एकर ले जिनगी नइ बनय। तैंहा अपन पढ़ाई-लिखाई म धियान लगाव। जब तैं ठुमक-ठुमक के चले लगे तब ले कई बछर तक तोर बाबूजी ह रोज रात म तोर पाँव धोवय अउ कहय ए मोर बेटा बड़ नाम कमाही। बता तैहाँ पढ़े-गुने बिना कइसे नाम कमाबे?” माँ की इस बात का मुझ पर जादुई असर हुआ। फिर मैं लीला-मण्डली जाना ही छोड़ दिया। और, मन में ठाना कि अब और ज्यादा पढ़ूंगा और अपने माँ-बाप के सपनों को पूरा करूंगा। उस दौर में कक्षा में हमारी उपस्थिति पूरे वर्ष में 98 से 99% तक हुआ करती थी।
एक बार की बात है। मैं मैथमेटिक्स साइंस का दसवीं कक्षा का विद्यार्थी था।
हमारा घर बस्ती में और बाड़ी सड़क तरफ थी। हमारा ज्यादातर बसर गली की ओर से निकलकर सड़क तरफ ही होता था। उस दौर में सड़क किनारे बैठकर कुछ बड़े बुजुर्ग मनोरंजन के लिए ताश खेलते थे। गर्मियों की छुट्टी में टाइम पास के लिए हम बच्चे लोग भी बावनजा, तीन-दो-पाँच, दहला पकड़ जैसे ताश के खेल खेला करते थे। नया सत्र की कक्षाएँ आरम्भ हो चुकी थीं। जुलाई का महीना था। बावनजा खेलने के चक्कर में स्कूल जाने में मैं लेट हो गया।
तब मेरी माँ मेरे दादाजी की गोटानी (जिसे देहात में कुबरी लाठी भी कहते हैं) को पकड़ कर ढूँढ़ते हुए वहाँ तक आ पहुँची और मुझे ताश खेलते हुए देख ली। वह इतना गुस्साई कि पूछो मत। वह मुझे मारी तो नहीं, लेकिन इस कदर डराई कि उस दिन से ताश खेलना छोड़ दिया। तब वह बोली थी- “जेन समे ह गुजर जाथे, ओ जिनगी म दुबारा नइ लहुटय। स्कूल म मास्टर ह का पढ़ाही, तेन ल कइसे जानबे अउ समंझबे?” सच में इस दुनिया में माँ-बाप जैसा शुभचिन्तक और सच्ची सलाह देने वाला दूसरा कोई नहीं हो सकता।
शायद यह पारिवारिक संस्कार का असर था कि कॉलेज में कदम रखते ही कइयों फड़ के ताशें फाड़कर सड़क किनारे होने वाले जुए को बन्द कराया। हमसे छोटे बच्चे जो दस पैसे, पाँच पैसे, चवन्नी-अठन्नी फेंक कर टीच और गच्चा खेलते थे, उन लोगों का मैं सबसे बड़ा दुश्मन था, क्योंकि मेरी माँ की यह बात याद थी कि जो समय गुजर जाता है, वह जीवन में कभी लौटकर नहीं आता। वे बच्चे मुझ पर नजर पड़ते ही डर से पैसे जीत का खेल बन्द कर नौ दो ग्यारह हो जाते थे या फिर मेरे गुजरते तक कहीं छुप जाते थे।
एक बार सड़क किनारे बड़े बुजुर्ग लोग चौरंगा खेल रहे थे। मैं चुपके से गया और ताश के पत्ते को फाड़ दिया। उस दिन एक जुआरी ने बवाल मचा दिया। हमारे परिवार के एक दादाजी उस व्यक्ति को पीटने के लिए उतारू हो गए। जब दो-तीन दिन बाद भेंट हुई तो मुझे समझाए कि- “गंवार लोगन गंवार ही रइहीं संगी। समाज सुधार के चक्कर ल छोड़ के अपन लाइफ बनाय म धियान लगाव।” लेकिन सच मानिए उस दिन के बाद से कोई ताश खेलते हुए नजर नहीं आए।
माँ स्वस्थ थी। हमारी बहू की सेवा-सुश्रुषा से अत्यन्त प्रभावित थी। 6 दिसम्बर की सुबह का नाश्ता करके मौसम खराब होने के कारण सड़क की ओर बालकनी में बैठी हुई थी। भारत यात्री छोटा पुत्र चीनू इस समय आया हुआ है। वह सोकर लेट से जगा था। चीनू विनोदी स्वभाव का है। वह नाश्ता करते हुए माँ को तीन-चार कौर रोटी खिलाया। उसके आधा घण्टा बाद बाथरूम में नहाने गई। वह बड़े इत्मीनान से नहा कर बाथरूम से अपनी आदत के मुताबिक “हे सतपुरस स्वामी” का उच्चारण करते हुए निकली और हाल में रखे बेड पर बैठते हुए बोली पुकारी- “ममता”। बहू का किचन से निकलना हुआ। माँ बेड में असामान्य रूप से झुकती नजर आई। वह माँ को सम्हालती हुई आवाज दी- “चीनू आओ, दाई एकाएक बेहोश हो गई। चीनू रूम से दौड़कर आया। दोनों मिलकर माँ को बेड पर लिटाए। तब दो बार हिचकी आई, फिर साँसें रुक गई।
चीनू तत्काल डॉक्टर को फोन लगाकर आने को कहा। डॉक्टर के आते तक हाथ-पैर की मालिश किये, ढेर सारे जतन किए जिससे कि ठीक हो जाए। लेकिन माँ अनन्त ब्रह्माण्ड में विलीन हो चुकी थी। डॉक्टर ने चेक करने के बाद सिर हिला कर कहा- “सारी, माता जी अब नहीं रही। यह कॉर्डियल अरेस्ट था।
कहते हैं लोग ऐसी सुखद मृत्यु लाखों में एकाध को नसीब होती है। जो भी व्यक्ति इस दुःखद खबर को सुने, वे स्तब्ध रह गए। सतगुरु से प्रार्थना है कि हमारी माँ मोगरा देवी टण्डन की आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दें, उन्हें शान्ति और सम्मान दें… और हम सबको इस दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें। ममतामयी माँ को शत-शत नमन्… अश्रुपूरित श्रद्धांजलि… ओम शान्ति, शान्ति, शान्ति…।
डॉ. किशन टण्डन क्रान्ति
“मातृछाया” दयापुरम
मस्तूरी-बिलासपुर (छ.ग.)


















