आलेख

‘छोटी जगहों के रचनाकारों की बड़ी अभिव्यक्ति’ श्री मनोज जायसवाल,संपादक सशक्त हस्ताक्षर छ.ग.

अतीत गवाह है हमारे बडे बडे साहित्यकार उन छोटे गांव से ताल्लुकात रखते थे वह उनका गृहग्राम हुआ  था, जहां अभावग्रस्तता के बावजूद अपनी कलम के बदौलत बड़ा नाम किया। देश की यह धरा कला एवं लेखन प्रतिभाओं में भी हमेशा उर्वरा रही है।प्रतिभाओं के लिए स्थान कोई महत्व नहीं रखता। न ही उनका कार्य में व्यस्तता कोई रोडे नहीं आता।

तरस तब आता है जब कोई किसी नगर मुख्यालय में रह कर किसी गांव के होनहार रचनाकार को अपने आप सें कम आंकता है।अब उन्हें कौन बताए कि तुम्हारा जब लेखन का शुरूआत हो रहा होगा तब ये कई रचनाएं लिख चुके थे।

 

सृजन की कडी में मौलिकता का प्रगाढ संबंध गांव के उस प्रतिभा के पास होता है। नगर में किसी विषय पर बने बनायी गयी खबर तो ऐसे ही मिल जाया करते हैं। अपनी उडान क्षमता का तो परिचय तब मिलता है जब स्वयं किसी खोजी न्यूज में पूरी तरह समा कर उसे सबके सरलता,सहजता के साथ प्रस्तुत करें।

 

उनके लिए यह सबसे बडे आश्चर्य की बात होगी जब सुदूर अंचलों में कई ऐसे अभावग्रस्तता के चलते प्रतिभाएं हैं, जिनकी रचनाएं तो उत्कृष्ट हैं लेकिन उनका प्रकाशन पत्र पत्रिकाओं के साथ किसी अखबार में भी नहीं हुआ। इससे भी बडा आश्चर्य तो तब होगा जब आपको यह जानकारी मिलेगी कि उन्हें कभी अपना नाम करने के चक्कर में आगे आने का खास शौक भी नहीं हुआ।

 

हां यह अमानत जरूर वे सहेज कर रखे हैं। सच कहें तो यह कुछ कम जोरी भी है। कमजोरी यह कि आपको जब यह जानकारी मिलेगा कि चाहे किसी भी प्रदेश के सांस्कृतिक गीत या रचना हो यह उस दूनियां के मीडिया से अछूते उस शख्स की रचना है जिन्हें चोरी कर उन्हें बाहर ऐसे नाम कर लिया गया कि अब उनका नाम बताना चाहेंगे तो कोई यकीं नहीं करेगा।

 

सच कहें तो लेखन, गायन सांस्कृतिक कला किसी बडे नगर में होने का मोहताज नहीं है। बडे नगरों में रह कर किसी छोटी जगहों में कर रहे रचनाकार को कभी छोटे समझने की गलती न करें उनक अभिव्यक्ति इतनी बडी है कि जहां से आपकी सोच खत्म हो वहां शुरू होती है। लेखन में खबरों का संकलन प्रकाशन शीर्ष नहीं, जबकि सृजन शीर्ष होता है।

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