”विवाह में सम्मानित पात्र लोकरहा लोकरहीन” श्री मनोज जायसवाल संपादक सशक्त हस्ताक्षर कांकेर(छ.ग.)

श्री मनोज जायसवाल
पिता-श्री अभय राम जायसवाल
माता-स्व.श्रीमती वीणा जायसवाल
जीवन संगिनी– श्रीमती धनेश्वरी जायसवाल
सन्तति- पुत्र 1. डीकेश जायसवाल 2. फलक जायसवाल
(साहित्य कला संगीत जगत को समर्पित)

”विवाह में सम्मानित पात्र लोकरहा लोकरहीन”
छत्तीसगढ की संस्कृति यहां की सांस्कृतिक परंपराओं में कोई भी नेग रस्म का आम लोकजीवन से खासा महत्व रखता है। पर गंभीरता से विचार नहीं कर पाने के चलते यह कहने तक भी सीमित होने का नकारात्मक भाव भी कुछ लोगों में होता है।
छत्तीसगढ में मुख्यतः हिन्दू धर्म में वर एवं वधु के सहयोगी बनाए जाते हैं। जिस पर तीन दिनों तक यानि शादी सम्पन्न होने तक की पुर्ण जिम्मेदारी होती है। इनकी स्वयं की गर कहीं अनुपस्थिति हुई तो परिवार एवं समाज भी इसे दोषी ठहरा सकता है।
इसलिए शादी होने तक लोकरहा लोकरहीन हमेशा वर वधू के बाजू में होते हैं। अगर इस दौरान वर वधू कोई गलत कदम उठाए तो इसका पूरा जिम्मेदारी समाज भी उसे ठहराता है। छत्तीसगढ में इसे लोकरहा, लोकरहीन कहा जाता है। वर पक्ष में लडके के जीजा तथा वधु पक्ष में उसकी बडी बहन लोकरहिन होती है।
लोकडहा शब्द रोकडहा का ही घिसा रूप आप मान सकते हैं। व्यावसायिक क्षेत्र में हिसाब किताब सम्हालने वाले को रोकडिया कहा जाता है। यही रोकडिया शब्द ही आगे चल कर विवाह रस्म में लोकरहा और छत्तीसगढ बोली में लोकडहा बना। इसी से आप समझ सकते हैं कि रोकडहा रोकडहीन की जिम्मेदारी कितना गंभीर होता है।
मंगरोहन से पुर्व ही चुलमाटी से ही से रोकडहा रोकडहीन की भुमिका प्रारंभ हो जाती है। यही वह पात्र है जिसे वर वधू अपनी आवश्यकता बताते हैं। विवाह अवसर पर यह सम्मानजनक स्थान भी है जिसका इंतजार उन्हें भी होता है कि वे बनें। जिसके परिवार में सगे दीदी जीजा नहीं होते उसमें यह जिम्मेदारी दूरस्थ रिश्तेदारी के दीदी जीजा को भी दी जाती है। रोकडहा लोकरहीन को न परिवार में उस वक्त सम्मान मिलता है, बल्कि उनकी भी इच्छानुरूप कपडे एवं उपहार से उन्हें नवाजा जाता है।


















