
दो मिनट का मौन….
हमारी कौम के
उन तथाकथित बहादुरों के नाम
जिन्होंने कौम का सर
ऊंचा उठाने के नाम पर
झुका दिया
दो मिनट का मौन….
उन पंडितों और विद्वानों के लिए
जिन्होंने जो पढ़ा या लिखा
उसका अभिप्राय और परिणाम
स्वयं ही
न समझ पाए
दो मिनट का मौन….
उन महिलाओं के लिए
जिन्होंने सास बहू
या किन्हीं अन्य
संबंधों में
गलत प्रतिस्पर्धा करके
अपनी ही जड़ों को
कमजोर किया
दो मिनट का मौन….
उन कलाकारों के नाम
जिन्होंने अपनी विधा को
ऊंचाई देने के लिए
कला की गहराई को जानने की
जरूरत ही नहीं समझी
दो मिनट का मौन….
उन पुरूषों की बहादुरी के लिए
जिन्होंने केवल जबान चलाकर ही
स्त्री की लगभग
हत्या कर डाली
दो मिनट का मौन….
उन लोगों के लिए
जिन्होंने भरसक प्रयत्न किए
कि चाहे किसी भी तरह
श्रेष्टि जनों की
पंक्ति में आगे रहें
और अंत में
दो मिनट का मौन
उस ईश्वर के लिये
जो यह सब
देखकर भी साक्षी बना रहा।


















