जगदलपुर में अब घरों में भी होने लगे काव्य पाठ कवियों की महफिल सजी
(मनोज जायसवाल)
—साहित्यकारों की नगरी जगदलपुर में अब काव्य पाठ का आयोजन किसी मंच का मोहताज नहीं। कवियों के घरों एवं दुकानों में होने लगे हैं‚काव्य पाठ।
जगदलपुर(सशक्त हस्ताक्षर)। साहित्य एवं कला समाज द्वारा हिन्दी पखवाड़ा पर आयोजित काव्यगोष्ठी दुर्गा चौक स्थित सनत जैन के घर पर हुयी। साहित्यकारों द्वारा हिन्दी भाषा को लेकर चिंतन में साबित किया कि हिन्दी भाष वर्तमान की आवश्यकता है। हिन्दी भाषा का विकास अब कोई चाहकर भी नहीं रोक सकता है। चिंतन के अलावा कवियों ने काव्यपाठ भी किया। जिसका सभी ने आनंद लिया।
प्रथम काव्य के रूप में सर्वप्रथम भूतपूर्व सैनिक व शौर्य के सशक्त हस्ताक्षर साहित्यकार ने अपनी देशभक्ति की रचनाओं के माध्यम से खूब तालियां बटोरी।
आजादी के दीवानों को याद करते हुये कहा-
कर्तव्य समझ कर इन सबने
अपने जीवन को तोला था
मेरा रंग दे बसंती चोला था।

चित्र—दुकान में बैठ कर काव्य पाठ करते साहित्यकार।
लोक कवि लोकरंगमंच कलाकार नरेन्द्र पाढ़ी ने हलबी भतरी कविताओं क साथ उसका हिन्दी अनुवाद भी सुनाया।
हिन्दी भाषा पर हल्बी में कविता सुनायी-
हिन्दी भजन आय, किर्तन आय
मंतर आय, जाप आय
पुजारी मन चो मान आय।
साथ ही बताया कि हमारी लोक बोली हल्बी, भतरी भी हिन्दी भाषा ही है।स्वर कोकिला डालेश्वरी पाण्डे जी ने हिन्दी भाषा पर शानदार सस्वर काव्यपाठ किया।
हिन्दी हृदय की धड़कन है
हिन्दी रिश्तों का बंधन है।
हिन्दी घर घर की बेटी है
हिन्दी त्याग, समर्पण है।
अपने साहित्य लेखन से अपनी विशिष्ट पहचान बनाने विनय श्रीवास्तव जी ने जड़, मूल, जैसे छोटे छोटे शब्दों को लेकर विभिन्न शाब्दिक प्रयोग करे हैं। अपने विभिन्न दोहों के पाठ से सबका मन मोह लिया।
एक लाख की आशा में
क्यूं कोख को करता लाल
इक दिन तू पछतायेगा
लाल दिखायें आंखें लाल!
ममता मधु ने अपनी सुरीली आवाज में धार्मिक कविताओं का पाठ किया। जिसमें जैन दर्शन, त्याग और मुनि दीक्षा की गूढ़ बातें शामिल थीं।

अंत में सनत सागर ने व्यंग्य कविता पढ़कर खूब हंसाया।
मच्छर सुनाते हैं प्यारी लोरिंया, खटमल खींचते हैं अपनी ओर
इन बाजुओं में दम चाहिये, सरकारी अस्पताल में सोने के वास्ते
भूतों का जरा भी डर नहीं, रोज मरते हुये मरीजों को देख देख
मगर छाती दमदार चाहिये, काकरोचों के साथ खेलने के वास्ते।
’उन्माद’ विषय को लेकर एक गहरी कविता पढ़ी-
उन्माद
बहता रक्त देखने का
तड़पता बदन देखने का
डर भरी चीख सुनने का
शैतान का ही रूप है,
कार्यक्रम का आनंद लेने आस पड़ोस कई लोग पधारे थे जिनमें से तरूण तिवारी शिक्षक आदि अंत तक काव्यपाठ सुनते रहे।


















