‘भारतीय भाषाओं के विकास में हिंदी की भूमिका’श्री पवन नयन जायसवाल वरिष्ठ साहित्यकार अमरावती‚विदर्भ(महाराष्ट्र)

साहित्यकार परिचय
श्री पवन नयन जायसवाल
माता- श्रीमती शकुंतला देवी जायसवाल
पिता – श्री नयन कुमार जायसवाल
जीवन संगिनी -श्रीमती शालिता जायसवाल
जन्म – 07 सितंबर 1961
शिक्षा – जीवन की पाठशाला में अध्ययनरत विद्यार्थी।
उपलब्धियाँ –
प्रकाशित कृतियाँ – महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, मुंबई की प्रकाशन अनुदान राशि के सहयोग से प्रकाशित कविता संग्रह श्अंत अभी शेष हैश्।
सम्पादन कार्य – सप्तरंग (काव्य संग्रह), मौन की महकती गंध (मुक्तक संग्रह), पीड़ा का पनघट (काव्य संग्रह)
सम्मान/अलंकरण –
लेखन- 45 वर्षों से सतत लेखन। हिंदी, मराठी भाषा में कविता, गीत, ग़ज़ल, हाइकु, कहानी, लघुकथा और समसामयिक विषयों पर लेख।
प्रकाशन- 400 से अधिक रचनाओं का देशभर से प्रकाशित प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन।
प्रसारण- दूरदर्शन केन्द्र से एक बार और नागपुर आकाशवाणी केंद्र से 22 बार काव्य रचनाओं का प्रसारण। स्थानीय चौनलों द्वारा आयोजित कवि सम्मेलनों में सहभाग के कई बार प्रसारण।
अन्य- ’सप्तरंगी हिंदी साहित्य संस्था, अमरावती का भूतपूर्व अध्यक्ष।
’कवि सम्मेलन में मंचों से काव्यपाठ।
’हास्य-व्यंग्य कवि के रूप में पहचान।
’सप्तरंग काव्य संग्रह का सहयोगी संपादक।
’साहित्य सम्मेलन और अखिल भारतीय कवि सम्मेलन आयोजनों के आयोजक।
’संत गाडगे बाबा, अमरावती विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग में विद्यार्थियों के लिए हिंदी भाषा और साहित्य पर कई बार उद्बोधन।
’पुस्तक विमोचन, राष्ट्रीय बैंक, महाविद्यालय और संस्थाओं द्वारा हिंदी में आयोजित कविगोष्ठी, साहित्य सम्मेलन, वाद-विवाद, काव्य व अन्य स्पर्धाओं में सहभागी, अतिथि एवं परिक्षक।
’महाविद्यालय, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सामाजिक संगठनों में व्यक्तित्व विकास पाठ्यक्रम में आमंत्रित प्रशिक्षक।
प्रकाशन राह पर- अनुभूतियों के हस्ताक्षर (काव्य संग्रह), जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी (हास्य-व्यंग्य संग्रह), शेष ही विशेष है।
सम्प्रति—
सम्पर्क— पूर्णिमा, किशोर नगर, अमरावती
(विदर्भ, महाराष्ट्र)
सुसंवाद, संदेश- 94217 88630

‘भारतीय भाषाओं के विकास में हिंदी की भूमिका’
मानव सभ्यता के विकास में भाषा का योगदान सबसे ज्यादा रहा है। भाषा, संवाद का माध्यम होती है जो जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। हमारे देश में कई भाषा और बोली का प्रयोग किया जाता है। 22 भारतीय भाषाओं को भारत की राजभाषा घोषित किया गया है।
भारत के पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण में बोली जाने वाली बहुत सी भाषाओं में से 22 भाषा भारत गणराज्य की अधिकारिक मान्यता प्राप्त राजभाषाएं या अनुसूचित भाषाएँ हैं, जिन्हें संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया है। इनमें हिंदी के साथ संस्कृत, मराठी, कोंकणी, असमिया, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगू और उर्दू का समावेश है।
हमारे देश के चलन मुद्रा में सभी राजभाषा का प्रयोग किया जाता है लेकिन इनमें हिंदी एक ऐसी भाषा है जो भारतियों के हृदय में रची बसी है और जनमानस इसे भारत की राष्ट्र भाषा मानता है। प्रत्येक भारतीय व्यक्ति प्रतिदिन हिंदी के संपर्क में आता ही है चाहे उसकी मातृभाषा हिंदी ना भी हो और वह अहिंदी प्रदेश का निवासी हो। यही कारण है कि जब दो अहिंदी भाषी संवाद करते हैं तब हिंदी का ही सहारा लिया जाता है।
यह सर्वमान्य है कि हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा है लेकिन अब वह वैश्विक भाषा भी बन चुकी है। हिंदी भाषा की विशेषता यह है कि वह सिखने और बोलने में आसान है और इसमें हम अपने विचारों को अच्छी तरह से व्यक्त कर सकते हैं। विश्व की हर भाषा के शब्द भी हिंदी में आसानी से लिखे और बोले जा सकते हैं इसलिए विश्व पटल पर भी हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार और प्रयोग दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। विश्व के बहुत से देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी को पढ़ाया जा रहा। अमेरिका जैसा देश राष्ट्रपति चुनाव में हिंदी का प्रयोग कर रहा। विदेशों द्वारा उनकी भूमि पर आयोजित वैश्विक सम्मेलनों में हिंदी शब्द ‘नमस्ते’ कहकर स्वागत किया जा रहा। भूमंडलीकरण का जबसे भूमंडीकरण हुआ है तबसे विदेशी कंपनियां भी अपने व्यापार के विज्ञापनों में हिंदी का प्रयोग कर रही है।
प्रवासी भारतीयों के कारण, रामचरितमानस और अन्य हिंदू धर्मग्रंथों के कारण हिंदी तो सदियों से विश्व के कई देशों जानी समझी और बोली जाती थी लेकिन भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने पहली बार अंतर्राष्ट्रीय मंच पर हिंदी में भाषण देकर हिंदी भाषा को भारतीय सीमा के साथ घर-परिवार से बाहर निकालने का जो महत्तम कार्य किया उसका विस्तार अब तेजी से हो रहा है। हिंदी भाषा के वैश्विक प्रचार-प्रसार में हमारे देश के उच्च शिक्षित युवा जो विदेशों में बसे हैं अपना अहम योगदान दे रहे हैं। हमारी हिन्दी भाषा की फिल्मों और उसके गीतों के साथ-साथ इस्कॉन और इस जैसे कई धार्मिक संगठन भी विश्व में हिंदी के ध्वजवाहक की भूमिका निभा रहे हैं।
आज हम इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि हिंदी ना केवल हमारे देश की सर्वमान्य राष्ट्रभाषा ही नहीं वैश्विक भाषा भी है। हिंदी दिवस, हिंदी के प्रचार-प्रसार में हमारे अपने योगदान के मूल्यांकन करने और गौरवान्वित होने का दिवस भी है।
हिंदी दिवस पर हम सभी विभिन्न भाषाओं को जानने, समझने और बोलनेवाले भारतवासियों को बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि भारतीय भाषाओं के विकास, संरक्षण और संवर्धन से ही भारतीय भाषाओं का विकास किया जा सकता है क्योंकि यह सब एक-दूसरे की सगी बहनें हैं। आज इनमें हिंदी जो हमारे देश और विदेश में भारत और भारतियों की पहचान है। सभी भारतीय भाषाओं में सबसे ज्यादा बोली, लिखी, जानने और समझने वाली भाषा हिंदी बड़ी बहन की भूमिका में हैं। आज सोशल मीडिया पर हिंदी भाषा देवनागरी लिपि के साथ-साथ रोमन लिपि में भी बहुत लिखी जा रही जो हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में सहायक तो है लेकिन की बार वह ठीक ढंग से और सही रूप में अभिव्यक्त नहीं हो पाती फिर भी हिंदी भाषा की सहायक लिपि के रूप में देवनागरी का साथ तो दे ही रही है।
आज हिंदी दिवस के अवसर पर हम सभी भारतवासियों को अपने देश में हिंदी के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं को ही बिना किसी राग या द्वेष भावना से आपस में बोलचाल का माध्यम बनाया जाना चाहिए जिससे भारतीय एकता, अखंडता, संप्रभुता, राष्ट्रीय और बंधुत्व भावना के साथ भारत की सभ्यता और संस्कृति का विकास भी किया जा सके और हिंदी इसमें प्रमुख भूमिका निभा रही हैं।
विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि भारतीय स्वतंत्रता की 1857 की क्रांति से 1947 में भारत की स्वतंत्रता तक हुए स्वतंत्रता आंदोलन की मशाल को सतत जलाएं रखने में हिंदी भाषा की प्रमुख भूमिका रही है। हिंदी के प्रचार-प्रसार, विकास और प्रमुख राष्ट्रीय भाषा बनाने में भी अहिंदी भाषी स्वतंत्रता सेनानियों, राजनेताओं, महापुरुषों, लेखकों और भाषा विज्ञानियों का बहुत योगदान रहा है और आज सभी भारतीय भाषाओं के विकास और संवर्धन के लिए इस भूमिका को हिंदी निभा सकती है इसलिए हिंदी भाषा का विकास ही सभी भारतीय भारतीय भाषाओं का भी विकास है।


















