“इंदु दीदी” श्रीमती कल्पना शिवदयाल कुर्रे “कल्पना” साहित्यकार बेमेतरा(छ.ग.)
साहित्यकार परिचय
श्रीमती कल्पना कुर्रे
माता /पिता – श्रीमती गीता घृतलहरे, श्री हेमचंद घृतलहरे
पति – श्री शिवदयाल कुर्रे
संतति पुत्र – 1. अभिनव 2. ऋषभ
जन्मतिथि – 19 जून 1988
शिक्षा- बी.ए. प्रथम उत्तीर्ण
पेशा – गृहणी
प्रकाशन-
1. विश्वात्मा (साझा संकलन)
2. एक पैगाम तेरे नाम (साझा संकलन)
3. इन्द्रधनुष (साझा संकलन)
4. शब्द-संसार (साझा संकलन)
5. साहित्य सुरभि (साझा संकलन)
6. करम किस्मत (साझा संकलन)
पुरस्कार⁄सम्मान–
4. कलमकार अक्षर सम्मान-2025
5.साहित्य श्री अलंकार-2025
6. साहित्य शब्दांजली सम्मान –
7. साहित्य सुरभि सम्मान -2025
8. श्री मयूर साहित्य सम्मान- 2024.
स्थायी पता – ग्राम – कातलबोड़़
पोस्ट – देवरबीजा,
तहसील – साजा,
जिला – बेमेतरा (छ.ग.)
संपर्क- मो. – 8966810173

“इंदु दीदी”
(यथार्थवादी कहानी)
दीदी को देखकर मन खुश हो जाता था उनकी मुस्कान इतनी प्यारी इतनी सुंदर जो रोते हुए को भी हंसा दे उनका स्वभाव देखकर रूठे हुए भी मान जाए और उनके सपने मानो आसमान को भी छू जाए तितली की तरह आनंद और स्वतंत्रता से भरी रंग बिरंगी, कोमलता,धीरज और संघर्ष से भरी फिर भी हार ना मानने वाली ऐसी थी वो मेरी इंदु दीदी,
मैं दसवीं क्लास में थी जब इंदु शहर से गांव में रहने आई थी इंदु के पिता शहर में सरकारी नौकरी करते थे इंदु उसकी मां और उसका छोटा भाई शहर में ही रहते थे इंदु की बड़ी बहन भी थी जो कि उसकी शादी हो गई थी इंदु के पिताजी के साथ कुछ हादसा हो गया था जिसमें उनकी मौत हो गई फिर सारा परिवार अपने गांव वाले घर में आकर रहने लगे वह भी मेरे घर के जस्ट साइड में कहो तो वह मेरी पड़ोसी बन गई थी ।
पर हमारे बीच कभी भी बातचीत नहीं हुई थी हालांकि रास्ते में आते-जाते हम एक दूसरे को देखा करते थे पर उसने कभी पहल नहीं की बात करने के लिए और ना ही मैंने ऐसे ही पूरा एक साल बीत गया फिर एक दिन अचानक मेरे घर का हैंडपंप खराब हो गया मैं दादी और बुआ के साथ मैं भी इंदु के घर के पास वाले हैंडपंप पर पानी भरने गई तभी इंदु भी वहां आई हुई थी ऐसे ही दो-तीन दिन वहां जाना हुआ फिर धीरे-धीरे हमने एक दूसरे को देखकर मुस्कुराया फिर कुछ- कुछ बातें शुरू हुई है मैं स्कूल चली जाती थी शाम को आती थी तो कभी भी मिलते तो एक दूसरे की ओर देखकर मुस्कुराते थे ऐसे ही चलता रहा फिर हमारी बातचीत बढ़ती गई और इतनी बढ़ गई कि वह मेरी बेस्ट फ्रेंड बन गई हालांकि वह उम्र में मुझसे तीन-चार साल बड़ी रही होंगी उसकी पढ़ाई अधूरी थी क्योंकि उनके पिता के जाने के बाद वो पढ़ाई छोड़ चुकी थी ।
और मेरी जारी थी मैं उसकी मां को बड़ी मां बुलाती थी मैं दूसरी जाति की थी और वह दूसरी जाति की पर हमारे बीच सगी बहनों जैसा अपनापन और सम्मान था मैं उसे हिंदू दीदी बुलाती थी पड़ोसी थे तो आना-जाना भी लगा रहता था वह मेरे घर हर त्यौहार में आती थी स्कूल के बाद गर्मियों में हम खूब मस्तियां करते थे मैं मेरी बहने और इंदु दीदी हमारे बगीचे में घूमने जाया करते थे दीदी आम के पेड़ में ढेर सारे आम देखकर इतना खुश होती थी कि उनकी खुशी का ठिकाना न रहता था ऐसे ही अपनापन और प्यार के सहारे हमारी जिंदगी चल रही थी फिर इंदु दीदी के लिए शादी का रिश्ता आया सबकी पसंद से दीदी ने शादी के लिए हां बोल दिया मुझे दुख तो बहुत हुआ कि अब दीदी की शादी हो जाएगी तो उनसे मिलना जुलना बात करना सब बंद हो जाएगा दीदी भी उदास थी पर उनकी उदासी का कारण कुछ और ही था जो की मैं उस बात से अनजान थी इतनी करीब होकर भी मैं दीदी के मन की बातों को समझ नहीं पाई उसने कई बार मुझे कुछ बताने की कोशिश की पर मैं ठहरी रूढ़िवादी पुराने ख्याल की मैंने कभी उनकी मन की बातो को समझने की कोशिश ही नहीं की ।
फिर कुछ दिनों बाद इंदु दीदी की चाची की बेटी जो कि मेरी छोटी बहन के साथ एक क्लास में पढ़ती थी उससे पता चला कि दीदी किसी लड़के से बात करती है और उस लड़के को पसंद करती है जो कि पहले मेरा क्लासमेट हुआ करता था मुझे अच्छा नहीं लगा उस लड़के के आचरण के बारे में मैंने कई बार खराब बातें सुनी थी इसलिए भी वह मुझे फुटी आँख नहीं सुहाता था मेरे जानने के बाद से दीदी अनजान थी मैंने भी कभी उनके सामने जाहिर नहीं होने दिया कि मैं उनके बारे में सब जानती हूँ वह मुझे कई बार समझने की कोशिश करती थी कि जरूरी नहीं हर रिश्ता गलत हो वह तो अपना-अपना नजरिया होता है कि किस तरह किसी भी परिस्थिति को समझा जाए पर मैं हमेशा उनकी बातों को अनदेखा और अनसुना कर देती थी दीदी जिस लड़के से प्यार करती थी वह दूसरे कास्ट का था उम्र में भी दीदी से छोटा था और स्टेटस का भी बहुत फर्क था और अगर दीदी के परिवार वालों को पता चलता तो बहुत बड़ी मुसीबत आ जाती इसलिए दीदी ने उस लड़के को भुलने का फैसला कर लिया था और परिवार वालों की पसंद से शादी के लिए मान गई थी फिर शादी की तैयारी शुरू हुई उनकी मां और भाई ने बहुत ही धूमधाम से उनकी शादी की इंदु दीदी की शादी के हर रस्मों रिवाजों में मैं उनके साथ थी जब बरात स्वागत हुआ तब वह लड़का भी वहां आया हुआ था।
बारात के साथ दीदी को देखने, मेरी नजर जब लड़के पर पड़ी और मैंने दीदी का मुरझाया चेहरा देखा तो मेरी धड़कन तेज सी हो गई उस लड़के की आंखों में नमी थी और दीदी की भी उस दिन शायद मुझे दीदी की तकलीफ का थोड़ा सा एहसास हुआ पर बहुत देर हो चुकी थी वह लड़का वहां से चला गया फिर दीदी की शादी हो गई फिर दीदी की विदाई हो गई अब बस उनके आने का इंतजार रहता था कभी-कभी त्यौहार या तीज पर ही मिलना हो पाता था ऐसे ही साल दो साल चार साल बीत गए अब मिलना या बात करना नहीं के बराबर हो गया था कुछ सालों बाद पता चला कि दीदी को दो बेटियां हुई है मुझे बहुत खुशी हुई फिर एक साल बाद दीदी के परिवार से पता चला की दीदी के पति का देहांत हो गया है यह सुनकर मुझे वहां दुख हुआ दो बेटियां और अब दीदी अकेली, यह सोचकर बहुत बुरा लगता था पर कभी उन्हें देख नहीं पाई क्योंकि मेरी भी शादी हो गई थी मैं भी अपने परिवार में व्यस्त हो गई थी पर इंदु दीदी के मायके वालों से उनके बारे में कुछ ना कुछ पता चल ही जाता था मैं अक्सर जब भी मायके आती थी तो दीदी की चाची से दीदी का हाल-चाल पूछ लिया करती थी ।
एक दिन मेरे मायके से मुझे पता चला कि दीदी की मां अब नहीं रही और उसका छोटा भाई सब जमीन जायदाद बेचकर अपने ससुराल चला गया है दीदी की बड़ी बहन भी यहां आना-जाना छोड़ चुकी है दीदी की छोटी बेटी को कैंसर हैं और उसका इलाज चल रहा है दीदी बहुत ही साहस से अपनी हर परिस्थितियों का सामना कर रही थी फिर उसकी बच्ची का ठीक होने का पता चला कुछ सालो तक उनके खैरियत का पता चला अब क्या था सब व्यस्त हो गए और मैं भी दीदी के बारे में कुछ पूछना तो दूर की बात मैं भूल गई कि वह अब अकेली है वह कैसे रहती होगी उनके ठीक होने की खबर मिलती तो मैं निश्चिंत रहने लगी थी अब 6,7 साल हो गए उनसे मिले अब उनके बारे में बात नहीं होती थी सब अपनी-अपनी लाइफ में व्यस्त थे एक दिन शाम को मेरी बहन का कॉल आया उसने मेरी खैरियत खबर ली और तबियत का पूछा मैंने सब ठीक है करके जवाब दिया तब मेरी बहन ने बताया कि तुम ज्यादा चिंता मत करना मैं बता रही हूं कि अब, इंदु दीदी नहीं रही उनका स्वर्गवास हो गया है मैं चुप हो गई मेरे कानों में जैसे सौ घंटिया बजने लगे थे मुझे चक्कर आ गया जैसे-तैसे खुद को संभाला पर मन अभी भी नहीं मान रहा था कि दीदी को कुछ हो गया है वह ऐसे कैसे हो सकता है इसी कशमकस में मैं पड़ गई थी और मेरे आंखों से मानो सावन बरस रहा था कुछ दिनों बाद मैं मायके गई और दीदी के चाचा से मिली तब चाची ने बताया कि इंदु दीदी के पति को एचआईवी था उसने छुपा कर दीदी से शादी की थी दीदी और उसकी बड़ी बेटी को भी एचआईवी हो गई थी पूरे परिवार की जिम्मेदारी दीदी पर आ गई थी उनके आगे पीछे कोई नहीं था उन्हें संभालने वाला ना मां-बाप ना भाई बहन और ना ही पति बच्ची भी बीमार इसी दुख में वह डूब गई और उनके अंदर जीने की इच्छा खत्म हो गई और ऐसे ही हालात के आगे उन्होंने अपने घुटने टेक दिए और मौत को गले लगा लिया।
‘ एक गलत इंसान के कारण तीन जिंदगियां बर्बाद हो गई इसलिए कहते हैं जब भी लड़के की पूरी जानकारी ना हो तब तक अपनी बेटियों की जिंदगी के साथ नहीं खेलना चाहिए।
‘ इंदू दीदी अब नहीं है पर मैं उन्हें हर दिन याद करती हूं शायद यह मेरे लिए एक सबब है मैं उन दिनों का खामियाजा भर रही हूं जब दीदी को मेरी जरूरत रही होगी और मैं उनके साथ नहीं थी मेरे अंदर यह एहसास होता है कि शायद मैं उनमें जीने की इच्छा जागा पाती मैं हर पल बस यही सोचती हूं की कास मैं उनसे एक बार बात कर पाती है जो कि अब नामुमकिन है।


















