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संयुक्त परिवार : संस्कार, सुरक्षा और स्नेह का अमर विद्यालय, आचार्य अशोक कुमार चौधरी ‘प्रियदर्शी’ कटिहार, बिहार

साहित्यकार परिचय

  आचार्य अशोक कुमार चौधरी ‘प्रियदर्शी’

पिता का नाम : स्वर्गीय सुशील चन्द्र चौधरी

पत्नी : श्रीमती सीमा चौधरी(लेखिका)

संतति : 1. श्रेया पुत्री (विवाहित) 2. आर्यन (अभियंता) 3. आदित्य (अभियंता) 4. आदर्श (अभियंता)

जन्म : 18 अप्रैल 1960

शिक्षा : स्नातकोत्तर

कार्य : सेवानिवृत्त वरिष्ठ बैंक अधिकारी

प्रकाशन : विभिन्न राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं तथा स्मारिकाओं में समसामयिक विषयों, इतिहास, समाजशास्त्र, ज्योतिष, साहित्य, संस्कृति एवं सामाजिक सरोकारों पर अनेक शोधपरक आलेख, कहानी, कविता, संस्मरण तथा विचारात्मक लेख प्रकाशित। विभिन्न सामाजिक एवं सांस्कृतिक विषयों पर निरंतर लेखन।

पुरस्कार/सम्मान : साहित्य, समाजसेवा, बैंकिंग सेवा तथा सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा अनेक सम्मान एवं प्रशस्ति-पत्र से सम्मानित।

सम्प्रति : ज्योतिष, हस्तरेखा, इतिहास एवं समाजशास्त्र के अध्येता एवं शोधकर्ता, समसामयिक विषयों के लेखक, विचारक एवं सामाजिक चिंतक। सेवानिवृत्ति के उपरांत विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संगठनों से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं तथा शोध, लेखन एवं जनजागरण के कार्य में निरंतर संलग्न हैं।

संपर्क :
ई-मेल : kautilya.astro@gmail.com
ई-मेल : ashoke.bms@gmail.com

मो. नं. : 9431229143,
7004313143
कटिहार, बिहार 854105

संयुक्त परिवार : संस्कार, सुरक्षा और स्नेह का अमर विद्यालय

नगरों की चमक-दमक और एकल परिवारों की बढ़ती प्रवृत्ति के बीच भी बिहार के एक छोटे से गाँव में स्थित चौधरी परिवार आज भी संयुक्त परिवार की जीवंत मिसाल था। विशाल आँगन, तुलसी चौरा, गौशाला, आम का बगीचा और घर के बीचों-बीच खड़ा बरगद का वृक्ष—सब मिलकर मानो यह संदेश देते थे कि जहाँ जड़ें मजबूत होती हैं, वहीं परिवार पीढ़ियों तक हरा-भरा रहता है।

इस परिवार के मुखिया थे दादाजी श्री हरिनारायण चौधरी। उनके साथ दादी सरस्वती देवी, बड़े पुत्र रामेश्वर, छोटे पुत्र महेश्वर, दोनों की पत्नियाँ, बच्चे, चाचा-चाची, भाई-बहन—सभी एक ही आँगन में रहते थे। त्योहार हो या कठिन समय, हर कार्य मिल-जुलकर होता था।गर्मी की छुट्टियों में शहर से दादाजी का बड़ा पोता आदित्य गाँव आया। वह महानगर के एकल परिवार में पला-बढ़ा था। उसे आश्चर्य होता था कि एक ही घर में इतने लोग कैसे रहते हैं। उसे लगता था कि अधिक लोग होंगे तो झगड़े भी अधिक होंगे।

पहली ही सुबह दादी ने प्रेम से पुकारा, “बेटा, पहले तुलसी को जल चढ़ा दो, फिर नाश्ता करना।” तभी चाची ने उसके लिए गरम पराठे बनाए, छोटी बहन ने पानी दिया और चाचा उसे खेत दिखाने ले गए। आदित्य पहली बार इतने आत्मीय वातावरण से परिचित हुआ।कुछ ही दिनों बाद परिवार में रक्षाबंधन का पर्व आया। बहनों ने भाइयों की कलाई पर राखी बाँधी। भाइयों ने जीवनभर रक्षा का संकल्प लिया। दादी की आँखें खुशी से भर आईं। उन्होंने कहा, “भाई-बहन का रिश्ता केवल राखी का धागा नहीं, जीवनभर का विश्वास होता है।”

कुछ सप्ताह बाद गाँव में एक विवाह समारोह था। वहाँ मौसा-मौसी, फूआ-फूफा, मामा-मामी, सभी रिश्तेदार दूर-दूर से आए। घर में मानो उत्सव उतर आया। मौसी ने बच्चों को लोकगीत सिखाए, फूआ ने परिवार की पुरानी स्मृतियाँ सुनाईं, फूफा ने युवाओं को शिक्षा और अनुशासन का महत्व बताया। हर रिश्ते का अपना अलग रंग था, पर उद्देश्य एक ही—परिवार को जोड़कर रखना।

एक दिन आदित्य ने दादाजी से पूछा, “दादाजी, इतने रिश्तों की आवश्यकता क्या है?”दादाजी मुस्कुराए और उसे बरगद के पेड़ के नीचे ले गए। बोले, “देखो बेटा, इस बरगद का तना माता-पिता हैं, इसकी जड़ें हमारे पूर्वज हैं, शाखाएँ चाचा-ताऊ हैं, पत्तियाँ बच्चे हैं और इसकी छाया पूरे परिवार को शीतलता देती है। यदि कोई एक शाखा टूट भी जाए, तो पूरा वृक्ष जीवित रहता है। संयुक्त परिवार भी ऐसा ही होता है।”इसी बीच दादाजी अचानक अस्वस्थ हो गए। पूरे परिवार ने बिना किसी भेदभाव के उनकी सेवा की। चाचा अस्पताल ले गए, चाची ने भोजन बनाया, बहनों ने दवाइयों का ध्यान रखा, भाइयों ने खेत और घर दोनों संभाले, दादी प्रार्थना करती रहीं। उस समय आदित्य ने देखा कि जहाँ अनेक हाथ होते हैं, वहाँ कोई अकेला नहीं पड़ता।

कुछ दिनों बाद दादाजी स्वस्थ होकर घर लौट आए। उन्होंने परिवार के सभी सदस्यों को बुलाकर कहा, “धन-संपत्ति का बँटवारा हो सकता है, लेकिन प्रेम का नहीं। जिस घर में भाई-भाई साथ रहते हैं, बहन का सम्मान होता है, चाचा पिता के समान और चाची माँ के समान स्नेह देती हैं, दादा-दादी संस्कारों की धरोहर बनते हैं, मौसा-मौसी और फूआ-फूफा आत्मीयता का सेतु बनते हैं—उस घर को कोई संकट पराजित नहीं कर सकता।”अब आदित्य का दृष्टिकोण बदल चुका था। शहर लौटते समय उसकी आँखें नम थीं। उसने अपने माता-पिता से कहा, “हम आधुनिक अवश्य बनें, पर अपने रिश्तों को कभी छोटा न होने दें। मोबाइल की सूची में सैकड़ों नाम हो सकते हैं, लेकिन संकट की घड़ी में साथ खड़े होने वाले अपने ही रिश्तेदार होते हैं।”

उस दिन से आदित्य ने निश्चय किया कि प्रत्येक पर्व पर वह अपने दादा-दादी, चाचा-चाची, भाई-बहन, मौसा-मौसी, फूआ-फूफा और समस्त परिवार से अवश्य मिलेगा। उसने समझ लिया था कि संयुक्त परिवार केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि साथ निभाने का संकल्प है।समय बीतता गया। दादाजी इस संसार से विदा हो गए, पर उनके संस्कार पूरे परिवार में जीवित रहे। बरगद का वह वृक्ष आज भी उसी आँगन में खड़ा है, मानो प्रत्येक आने वाली पीढ़ी से कह रहा हो—

“रिश्ते रक्त से बनते हैं, पर प्रेम, त्याग, सम्मान और विश्वास से जीवित रहते हैं।”

आज जब समाज एकाकी जीवन की ओर बढ़ रहा है, तब संयुक्त परिवार केवल एक व्यवस्था नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति है। जहाँ दादा-दादी का अनुभव, माता-पिता का परिश्रम, चाचा-चाची का स्नेह, भाई-बहन का अपनापन, मौसा-मौसी का वात्सल्य और फूआ-फूफा का आशीर्वाद एक साथ मिलता है, वहाँ जीवन का हर संघर्ष सरल हो जाता है। संयुक्त परिवार वास्तव में एक ऐसा बरगद है, जिसकी छाया में प्रेम, संस्कार, सुरक्षा, सहयोग और आत्मीयता की शीतल हवा पीढ़ी-दर-पीढ़ी बहती रहती है।

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