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“सूखे पत्ते” श्रीमती कल्पना शिवदयाल कुर्रे “कल्पना” साहित्यकार बेमेतरा(छ.ग.)

साहित्यकार परिचय
श्रीमती कल्पना कुर्रे  
माता /पिता – श्रीमती गीता घृतलहरे, श्री हेमचंद घृतलहरे 
पति – श्री शिवदयाल कुर्रे
संतति  पुत्र – 1. अभिनव 2. ऋषभ
जन्मतिथि – 19 जून 1988
शिक्षा- बी.ए. प्रथम उत्तीर्ण

पेशा – गृहणी

प्रकाशन-

1. विश्वात्मा (साझा संकलन)
2. एक पैगाम तेरे नाम (साझा संकलन)
3. इन्द्रधनुष (साझा संकलन)
4. शब्द-संसार (साझा संकलन)
5. साहित्य सुरभि (साझा संकलन)
6. करम किस्मत (साझा संकलन)

पुरस्कार⁄सम्मान–

4. कलमकार अक्षर सम्मान-2025
5.साहित्य श्री अलंकार-2025
6. साहित्य शब्दांजली सम्मान –
7. साहित्य सुरभि सम्मान -2025
8. श्री मयूर साहित्य सम्मान- 2024.

स्थायी  पता – ग्राम – कातलबोड़़
पोस्ट – देवरबीजा,
तहसील – साजा,
जिला – बेमेतरा (छ.ग.)

संपर्क- मो. – 8966810173

“सूखे पत्ते”
(आलेख)

मैं भारत की बेटी हूं वहीं भारत जहां बेटियों को बेटों के समान अधिकार तो मिल जाता है कहने के लिए लेकिन जब अधिकार देने की बात आती है तो हमारा समाज परिवार पीछे हट जाता है आज के इस टेक्नोलॉजी के जमाने में भी हमारा देश गांव समाज के रीति रिवाज व नियम कानून नहीं बदल पाए हैं यहां कहने भर के लिए आजादी तो दे दी जाती है पर निभा कोई नहीं पाता आज भी समाज के परिवारों में बेटियों के लिए ‘दहेज’ जमा करने की प्रथा है । इस प्रथा से न जाने कितनी बेटियों का पूरा जीवन खराब हो चुका है फिर भी किसी ‘समाज’ में जागरूकता नहीं आई है आज भी लोग यही समझते हैं कि बेटियों को दहेज देने से उनके ऊपर हो रहे अत्याचार मानसिक वेदनाएं खत्म हो जाएंगे इसलिए परिवार के लोग अपनी बेटियों के लिए दहेज इकट्ठा करने में लगे रहते हैं लेकिन वह यह नहीं समझ पाते हैं‚ कि दहेज तो एक शुरुआत मात्र है बेटियों के प्रताड़ित न होने में इस दहेज का एक हिस्सा भी किसी काम का नहीं है।

यह ‘समाज’ कब समझ पाएगा की बेटियों के लिए दहेज इकट्ठा करने के बजाय उनके भविष्य निर्माण के लिए इन्हीं पैसों को खर्च करना चाहिए हमारा समाज परिवार बेटियों की शादी के लिए पैसा जमा करते हैं उन्ही पैसों से वह अपने पैरों में खड़ी हो सकती हैं अपना जीवन गर्व और साहस पूर्वक जी सकती हैं शादी के लिए जितना पैसा खर्च कर देता है यह समाज परिवार लेकिन वही पैसा लड़कियों के भविष्य के लिए नहीं रख पाता आज के समाज में बेटियों के ऊपर पैसा लगाने से उन्हें पढाने लिखाने में जो खर्च होता है उसे सब व्यर्थ समझते हैं शादी करके भेज देने मात्र से किसी भी बेटी का जीवन खुशियों से भर जाएगा यह सोच हमारे परिवार और समाज की गलतफहमी है ।

आज कल कितने ही केस देखने को मिल जाता है कि दहेज के कारण किसी बेटी को जला देते हैं या जहर दे देते हैं या तो फिर एक बीवी के रहते दूसरी ले आते हैं उनके आगे की जिंदगी का कोई नहीं सोचता यह एक गलत फैसला कई बेटियों की जिंदगी बर्बाद करके रख देता है आज के इस नए समाज को चाहिए कि वह बेटियों की शादी में खर्च करने की बजाय उनकी पढ़ाई लिखाई शिक्षा और रोजगार के लिए खर्च करें ताकि भविष्य में कोई उनका हाथ छोड़ भी दे कोई तो भी अपना जीवन स्वाभिमान के साथ जी सके आज भी कई लड़कियां हाउसवाइफ है बाहर काम करने नहीं जा सकती और जो लड़कियां जा सकती हैं ।वह मजबूर हैं अपने परिवार के आगे कई लड़कियां पैसों की कमी के कारण आगे नहीं बढ़ पाती हैं उनकी समर्थ और उत्साह खत्म हो जाता है अपने सपनों का महल तो सजा लेती हैं पर उन्हें बिखरने में एक क्षण मात्र ही काफी होता है ना तो वह आगे बढ़ सकती हैं और ना ही वह अपने लिए कुछ कर सकती हैं बस मजबूर होकर अपना जीवन जीने के बजाय बस इसे काट रही है।

‘अपने सपनों का कब्र बनाकर वे जी तो लेती हैं पर उन्हें अपना ही जीवन बेमकसद और व्यर्थ पूर्ण लगने लगता है ठीक उसी तरह जैसे किसी पेड़ के पत्ते गिरने के बाद उसका अपना कोई अस्तित्व नहीं रहता वे पेड़ से गिरकर सूख जाते हैं और अगर उसे कोई समेटता भी है तो सिर्फ उसे जलाने के लिए।

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