आलेख काव्य देश राज्य

‘सरहद पर जिंदगी कैसी चलती है’ कु. माधुरी मारकंडे साहित्यकार‚धमतरी(छ.ग.)

साहित्यकार परिचय
कु. माधुरी मारकंडे
जन्मतिथि – 05.01.1995,बलियारा(धमतरी)
माता-पिता – श्रीमती दिलेश्वरी, श्री नारायणदास मारकंडे
शिक्षा – एम ए राजनीति विज्ञान, डीसीए
प्रकाशन – एक कविता संविधान नियमित लेखन

सम्मान – 2013 निबंध प्रतियोगिता में कलेक्टर द्वारा
सम्प्रति-
संपर्क-  ग्राम बलियारा पोस्ट भोथली जिला-धमतरी (छ.ग.) मो. 9329124373

‘सरहद पर जिंदगी कैसी चलती है”

सरहद पर जिंदगी कैसी चलती है ,क्योंकि सरहद पर न जाने हजारो सैनिक हमारी सुरक्षा में तैनात रहते हैं । जो कटीली झाड़ियां रेत रेगिस्तानों में ,बर्फीले चोटियो में अपनी जिंदगी बिताते हैं, उनकी जिंदगी किसी तपस्या से कम नहीं रहती। और हम दिन रात घर परिवार में रहकर सिर्फ मेरा परिवार, मेरा घर कहकर जीवन बिता देते हैं। लेकिन जो सरहद पर हमारी सुरक्षा में तैनात है, अपने घर परिवारों को छोड़कर , ताकि हम अपने घरों में सुरक्षित रह सके।

लेकिन हम इतने स्वार्थी हैं की हम उसे नौकरी पेशा या उनका फर्ज समझते हैं जरा सोचिए किसी पत्नी का पति रोज काम पर जाता हो , और वह समय पर घर आ जाता हो ।किंतु किसी कारणवश किसी दिन समय पर घर नहीं पहुंचता है तो उसे उसकी चिंता होने लगती है। लेकिन उस पत्नी या उस मां के बारे में जरा सोचिए जो न जाने कितने महीनों से अपने पति या अपने बेटे को नहीं देखी होगी।

देश की बात हो यह समाज की बात चाहे हम सरहद हो या चाहे हम घर पर लेकिन हमारा दायित्व केवल और केवल हम तक सीमित नहीं रहना चाहिए। समाज के उस हर वर्ग का जो जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं , या सहायता के लिए कोई गुहार कर रह हो तो हमें उसकी सहायता अपनी क्षमता के अनुसार जरूर करना चाहिए।
क्योंकि हमारा दायित्व ही हमें जिंदा रखता है। हम समाज में जीवित हैं मृत, नही क्योंकि सरहद पर केवल और केवल दायित्वों से भरा जीवन होता है।….

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