‘दौर‚क्रांतिकारी लेखन का’ श्री मनोज जायसवाल संपादक सशक्त हस्ताक्षर कांकेर(छ.ग.)

श्री मनोज जायसवाल
पिता-श्री अभय राम जायसवाल
माता-स्व.श्रीमती वीणा जायसवाल
जीवन संगिनी– श्रीमती धनेश्वरी जायसवाल
सन्तति- पुत्र 1. डीकेश जायसवाल 2. फलक जायसवाल
(साहित्य कला संगीत जगत को समर्पित)

तस्लीमा नसरीन की बुक है क्या? आज भी बुक डिपो में इनकी किताबें बिका करती है, तो कई साहित्य प्रेमी उसे संजोकर रखे हुए हैं। यही नहीं बीच-बीच में बड़े चाव से पढ़ते हैं। उन्होंने अपनी बुक बेचे जाने का कभी प्रचार नहीं किया। हां वह खुल कर पूरी मुखरता के साथ लिखी। सोशल मीडिया नहीं था,तब भी इतना प्रसिद्व हुई कि बताने की जरूरत ही नहीं है।
आज भी बुक लिखी जाती है,बिक्री के लिए तमाम प्रयास किया जाता है,लेकिन नहीं फिर भी नहीं बिकती। गत दिनों ही सोशल मीडिया में एक नामी प्रकाशक ने कमेंट में कहा कि पुट्ठे निकाल दो तो 8 रूपये प्रति किलो पर पुस्तकें उपलब्ध है। इतने टन कि बिक नहीं रही। जब प्रकाशक ऐसा बोल रहा है तो अंदाजा लगाया जा सकता है। तस्लीमा की किताबें जरूर बिकी आज भी बिकती है लेकिन ऐसा बहुत कम लिखा जा रहा है। घास फंूंस की कविताएं और काल्पनिक कथा,कहानियां लोग अब पढ़ने से रहे।
उन्हें तो सम सामयिक घटनाओं पर त्वरित टिप्पणी वाली और ज्वलंत विषयों पर आलेख एवं काव्य चाहिए। जो हिला कर रख दे। राष्ट्रवादी काव्य तक नहीं पढ़े जा रहे। लेकिन कवि सम्मेलनों में वीर रस धारित कविताएं जब पढ़ी जाती है,पूरे जोश से तो सोए भी जाग जाते हैं। पोर्टल का जमाना है, पाठकों को लिंक चाहिए या सोशल पर आलेख! इसके बावजूद यह भी पूर्णतः नहीं कह सकते कि इसे भी पढ़ सकें। हेड लाइन के साथ कुछ पंक्तियां लगातार मोबाईल पर उंगली फिराती आंखों को जवाब दे जाती है।
जब किसी को फ्री में पुस्तकें उपलब्ध है,लाईब्रेरी है वो नहीं पढ़ पा रहे हैं तो वो खरीद के क्यों पढ़ें? अखबारी सुर्खियों को ही लें। विचार करें कि कौन-कौन प्रमुखता से खबरें पढ़ते हैं? अमूमन हेडलाईन पर ध्यान दिया जाता देख लिये तो नहीं तो घर के एक कोने पर नये के नये पड़ा मिलता है अखबार। इसी अखबार की विज्ञापन पृष्ठ वही निहारते हैं,जो पैसे देकर विज्ञापन दिए होते हैं बाकी पाठक तो पढते समय वह पृष्ठ ही अलग कर देते हैं।
कई दफा तो खुद खबर लिखने वाला अखबार से खबर नहीं पढ़ता। कुल मिलाकर वर्तमान समय क्रांतिकारी लेखन का है। ज्वलंत विषयों पर वो भी कम शब्दों में बताने का प्रयास हो तो। बाकी ज्यादा मैटर दिखायी देने पर भी लोगों का ध्यान भंग होते देखा जा सकता है। जमाने के बाजार में मैंने राजनीतिक उठापटक,वाद विवादों पर अखबार जलते देखा लेकिन इसी बाजार में कभी अश्लील साहित्य जलते नहीं देखा। चप्पलें कांच के रैक में शोभायमान है और साहित्य घर के किसी कोने में जाले लग रहे हैं।


















