साहित्यकार परिचय
श्रीमती कल्पना कुर्रे
माता /पिता – श्रीमती गीता घृतलहरे, श्री हेमचंद घृतलहरे
पति – श्री शिवदयाल कुर्रे
संतति पुत्र – 1. अभिनव 2. ऋषभ
जन्मतिथि – 19 जून 1988
शिक्षा- बी.ए. प्रथम उत्तीर्ण
पेशा – गृहणी
प्रकाशन-
1. विश्वात्मा (साझा संकलन)
2. एक पैगाम तेरे नाम (साझा संकलन)
3. इन्द्रधनुष (साझा संकलन)
4. शब्द-संसार (साझा संकलन)
5. साहित्य सुरभि (साझा संकलन)
6. करम किस्मत (साझा संकलन)
पुरस्कार⁄सम्मान–
4. कलमकार अक्षर सम्मान-2025
5.साहित्य श्री अलंकार-2025
6. साहित्य शब्दांजली सम्मान –
7. साहित्य सुरभि सम्मान -2025
8. श्री मयूर साहित्य सम्मान- 2024.
स्थायी पता – ग्राम – कातलबोड़़
पोस्ट – देवरबीजा,
तहसील – साजा,
जिला – बेमेतरा (छ.ग.)
संपर्क- मो. – 8966810173

” मीनू”
शोक और राधा को तीन बेटियां थी इसलिए अशोक को बहुत निराशा और गुस्सा थी अशोक अपनी बेटियों को ना पसंद तो नहीं करता था पर उनके होने से अपनी जिंदगी ही खराब समझता था,‘अशोक और राधा दोनों एक ही कॉलेज थे दोनों एक दूसरे को बहुत पसंद करते थे इसलिए घर वालों के मना करने के बावजूद भी अशोक ने राधा से शादी कर ली थी अशोक किसी कंपनी में जॉब करता था राधा घर पर ही रहकर कुछ व्यवसाय करना चाहती थी इसलिए अशोक ने पहले से ही काफी उधार ले रखा था राधा का व्यवसाय भी चलने लगा था तभी पता चला कि वह मां बनने वाली है घर वालों के खिलाफ जाकर दोनों ने शादी तो कर ली थी ।
पर दोनों का साथ देने वाला कोई नहीं था दोनों अलग रहते थे धीरे-धीरे समय बीतता गया राधा थोड़ी कमजोर होने लगी इसलिए उसका व्यवसाय बंद हो गया अशोक इस बात से चिढ़ने लगा था पर वह राधा का ख्याल भी रखता था एक दिन वह दोनों डॉक्टर के पास गए सोनोग्राफी रिपोर्ट से पता चला कि राधा के पेट में दो बच्चे हैं अशोक और भी चिंतित हो गया अब तो दो बच्चों का खर्च कैसे संभालूंगा फिर दिन बीता और डिलीवरी का समय आ गया राधा ने दो जुड़वा बच्चियों को जन्म दिया अशोक खुश तो हुआ पर दो बेटियां एक साथ सोच कर वह दुखी भी हो गया अशोक के घर वालों को बच्चियों का पता चला तो वह दोनों को परिवार में ले आए पर परिवार में दो बूढ़े मां-बाप और दो बहने भी थे उनकी भी शादी नहीं हुई थी राधा अपने बच्चियों पर पूरा ध्यान देने लगी अशोक को परिवार का खर्च और दो-दो बेटियों का पालन पोषण से परेशान हो गया था कंपनी में अशोक का प्रमोशन हो गया था ।
इसलिए वह सारे खर्चो का को मैनेज कर लेटा था अशोक और राधा की बेटियां थोड़ी बड़ी हो गई फिर एक दिन पता चला कि राधा फिर से मां बनने वाली है तभी सभी घर वालों ने पोते की इच्छा जाहिर की राधा थोड़ा उदास हो गई थी कि आप तो भगवान पर ही भरोसा है यह कहते-कहते डिलीवरी का दिन आ गया उसे फिर से एक बच्ची हुई अशोक और उसके माता-पिता का मन टूट गया फिर भी सब ने अपनी जिम्मेदारी निभाई बाद में तीनों बेटियां धीरे-धीरे बड़ी होने लगी अशोक का गुस्सा राधा के लिए बढ़ता गया परिवार का खर्च और तीन बेटियां यह सोचकर उसके मन में आक्रोश की भावना ने जन्म ले लिया था फिर कुछ सालों में राधा फिर से मां बनने वाली थी और इस बार अशोक ने उसे चेतावनी दे रखी थी कि इस बार अगर लड़का नहीं हुआ तो मैं तुम्हें अपने मायके छोड़ आऊंगा ,खाली समय में राधा यही सोचती थी कि इस बार क्या होगा ।
पर अशोक की आर्थिक स्थिति तो पहले से ही सुधर चुकी थी पर उसे इस बार बेटा ही चाहिए था समय बिता और वह दिन आ गया जब राधा को प्रसव पीड़ा होना शुरू हो गया वह मन ही मन बहुत घबरा रही थी कि इस बार भगवान की क्या मर्जी है यह सोच-सोच कर उसने अपनी तबीयत बिगाड़ ली थी इस बार उसकी नॉर्मल डिलीवरी की संभावना बहुत कम थी उसका बीपी हाई हो गया था और भी कई समस्याएं हो गई थी फिर भी उसके घर वालों ने उसे अस्पताल ले जाने के बजाय घर में ही डिलीवरी करने के लिए दाई मां को घर बुलाया रखा था दाई मां ने राधा को अच्छे से जांचा फिर उन्होंने राधा को अस्पताल ले जाने की सलाह दी पर घर में कोई नहीं माना सबके जिद के कारण घर पर ही उसकी डिलीवरी कराई गई डिलीवरी अच्छे से हो गई पर राधा बेहोश हो गई थी और बच्चे की कोई रोने की आवाज भी नहीं आई दाईमां थोड़ा घबराते हुए घर वालों को खुशखबरी सुनाने गई कि आपके घर लक्ष्मी आई है अशोक के साथ-साथ उसके माता-पिता ने अपना सर पकड़ लिया।
अशोक का मन क्षोभ से भर गया और तभी दाईमां ने बताया की बच्ची को ठीक से सांस नहीं आ रही वह रो भी नहीं रही मैंने बहुत कोशिश की मगर कुछ समझ में नहीं आया उसे फौरन अस्पताल ले जाना होगा अशोक के मन में एक बात आई कि यह बच्ची अब नहीं बच सकती इसलिए बिना डॉक्टर को दिखाये ही सबने उसे मारा हुआ मान लिया दीई मां को अशोक ने बच्ची को ले जाकर फेंकने के लिए कह दिया और उन्हें कुछ पैसे भी दे दिए दाई मां पैसों के लालच में उस बच्ची को कही फेंक आई वहीं पर कुछ दूर एक बनिये का परिवार रहता था उनकी कोई भी संतान नहीं थीं वह एक बच्चे के लिए तरस रहे थे बनिये की पत्नी घर का कूड़ा करकट वही फेंका करती थी जहां दाई मां ने बच्ची को फेंका था वह भी एक बोरी में लपेटकर बनिये की पत्नी जब कचरा फेंकने गई तब कुछ कुत्ते बोरी को खींच रहे थे उसने देखा की बोरी से हल्का सा खून निकल रहा है बनिये की पत्नी ने हिम्मत करके उन कुत्तों को वहां से भगाया और वह डरती हुई उस बोरी को जांचा तो वह दंग रह गई जैसे उसका मुंह कलेजा को आ गया ।
उसने चुपके से उसे बोरी को उठाया और अपने साथ अपने घर ले गई वहां उसने बनिये को वह दिखाया फिर दोनों ने देखा कि एक नवजात शिशु उस बोरी में गंभीर हालत में थीं दोनों ने बिना देर किए उस बच्चे को डॉक्टर के पास ले गए जहां उसका अच्छे से इलाज शुरू हुआ कुछ दिनों बाद वह बच्ची पूरी तरह से ठीक हो गई दोनों बच्ची को अस्पताल से घर लाए और उसका अच्छे से स्वागत किया दोनों ने तो उसी दिन उसे अपनी बच्ची मान लिया था जिस दिन वह अधमरी हालत में कचरे में मिली थी फिर भी उन दोनों ने उसे अपना नाम देने का फैसला किया और उसे गोद ले लिया दोनों ने उसका नाम “मीनू” रखा उसे बड़े ही नाजों से पाला उसे पढ़ाया लिखाया और उसे आत्मनिर्भर बनाया उसे अपने पैरों पर खड़ा किया समाज में सम्मान और पहचान दिलाया अशोक और राधा को अपनी बेटी के बारे में पहले से पता चल चुका था पर वह किस मुंह से उसपे अपना अधिकार जताते हैं इसलिए बस वह खामोशी से अपनी बेटी की कामयाबी देखते रहे।
‘आज मीनू एक डॉक्टर है और लोगों का इलाज कर रही है उसे अपने बारे में सब पता है कि कैसे उसे मरा हुआ समझ कर फेंक दिया गया था पर उसे इस बात पर कोई अफसोस नहीं है जबकि उसे इस बात का गर्व है कि वह एक डॉक्टर है और सब की सेवा कर रही है और आगे भी वह सब की सेवा करते रहेगी।


















