‘‘ राजा भतृहरि का जीवनवृत्त एवं किंवदंतियां-भर्थरी गाायन विधा की वर्तमान स्थिति ’’ डॉ रामायण प्रसाद टण्डन वरिष्ठ साहित्यकार कांकेर छ.ग.

साहित्यकार परिचय-
डॉ. रामायण प्रसाद टण्डन
जन्म तिथि-09 दिसंबर 1965 नवापारा जिला-बिलासपुर (म0प्र0) वर्तमान जिला-कोरबा (छ.ग.)
शिक्षा-एम.ए.एम.फिल.पी-एच.डी.(हिन्दी)
माता/पिता –स्व. श्री बाबूलाल टण्डन-श्रीमती सुहावन टण्डन
प्रकाशन – हिन्दी साहित्य को समर्पित डॉ.रामायण प्रसाद टण्डन जी भारत के छत्तीसगढ़ राज्य में हिन्दी के स्तंभ कहे जाते हैं। हिन्दी की जितनी सेवा उन्होंने शिक्षक के रूप में की उतनी ही सेवा एक लेखक, कवि और एक शोधकर्ता के रूप में भी उनकी लिखी पुस्तकों में-1. संत गुरू घासीदास की सतवाणी 2. भारतीय समाज में अंधविश्वास और नारी उत्पीड़न 3. समकालीन उपन्यासों में व्यक्त नारी यातना 4. समता की चाह: नारी और दलित साहित्य 5. दलित साहित्य समकालीन विमर्श 6. कथा-रस 7. दलित साहित्य समकालीन विमर्श का समीक्षात्मक विवेचन 8. हिन्दी साहित्य के इतिहास का अनुसंधान परक अध्ययन 9. भारतभूमि में सतनाम आंदोलन की प्रासंगिकता: तब भी और अब भी (सतक्रांति के पुरोधा गुरू घासीदास जी एवं गुरू बालकदास जी) 10. भारतीय साहित्य: एक शोधात्मक अध्ययन 11. राजा गुरू बालकदास जी (खण्ड काव्य) प्रमुख हैं। 12. सहोद्रा माता (खण्ड काव्य) और 13. गुरू अमरदास (खण्ड काव्य) प्रकाशनाधीन हैं। इसके अलावा देश के उच्च स्तरीय प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में, राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी सेमिनार में अब तक कुल 257 शोधात्मक लेख, आलेख, समीक्षा, चिंतन, विविधा तथा 60 से भी अधिक शोध पत्र प्रकाशित हैं। आप महाविद्यालय वार्षिक पत्रिका ‘‘उन्मेष’’ के संपादक एवं ‘‘सतनाम संदेश’’ मासिक पत्रिका के सह-संपादक भी हैं। मथुरा उत्तर प्रदेश से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘‘डिप्रेस्ड एक्सप्रेस’’ राष्ट्रीय स्तरीय पत्रिका हिन्दी मासिक के संरक्षक तथा ‘‘बहुजन संगठन बुलेटिन’’ हिन्दी मासिक पत्रिका के सह-संपादक तथा ‘‘सत्यदीप ‘आभा’ मासिक हिन्दी पत्रिका के सह-संपादक, साथ ही 10 दिसम्बर 2000 से निरंतर संगत साहित्य परिषद एवं पाठक मंच कांकेर छ.ग और अप्रैल 1996 से निरंतर जिला अध्यक्ष-पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी सृजनपीठ कांकेर छ.ग. और साथ ही 27 मार्च 2008 से भारतीय दलित साहित्य अकादमी कांकेर जिला-उत्तर बस्तर कांकेर छ.ग. और अभी वर्तमान में ‘‘इंडियन सतनामी समाज ऑर्गनाईजेशन’’ (अधिकारी/कर्मचारी प्रकोष्ठ) के प्रदेश उपाध्यक्ष.के रूप में निरंतर कार्यरत भी हैं।
पुरस्कार/सम्मान – 1-American biographical Institute for prestigious fite *Man of the year award 2004*research board of advisors (member since 2005 certificate received)
2. मानव कल्याण सेवा सम्मान 2005 भारतीय दलित साहित्य अकादमी छत्तीसगढ़ 3. बहुजन संगठक अवार्ड 2008 भारतीय दलित साहित्य अकादमी छत्तीसगढ़ 4. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी स्मृति प्रोत्साहन पुरस्कार 2007(बख्शी जयंती समारोह में महामहिम राज्यपाल श्री ई.एस.एल. नरसिंम्हन जी के कर कमलों से सम्मानित। इनके अलावा लगभग दो दर्जन से भी अधिक संस्थाओं द्वारा आप सम्मानित हो चुके हैं।) उल्लेखनीय बातें यह है कि आप विदेश यात्रा भी कर चुके हैं जिसमें 11वां विश्व हिन्दी सम्मेलन मॉरीसस 16 से 18 अगस्त 2018 को बस्तर संभाग के छत्तीसगढ़ भारत की ओर से प्रतिनिधित्व करते हुए तीन दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेकर प्रशस्ति-पत्र प्रतीक चिन्ह आदि से सम्मानित हुए हैं।
सम्प्रति – प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, शोध-निर्देशक (हिन्दी) शासकीय इन्दरू केंवट कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय कांकेर, जिला- कांकेर (छत्तीसगढ़) में अध्यापनरत हैं। तथा वर्तमान में शहीद महेन्द्र कर्मा विश्वविद्यालय बस्तर जगदलपुर छत्तीसगढ़ की ओर से हिन्दी अध्ययन मण्डल के ‘‘अध्यक्ष’’ के रूप में मनोनित होकर निरंतर कार्यरत भी हैं।
सम्पर्क –मकान नं.90, आदर्श नगर कांकेर, जिला- कांकेर, छत्तीसगढ़ पिन-494-334 चलभाष-9424289312/8319332002

एक दिवसीय शोध संगोष्ठी 10 मार्च 2024
‘‘ राजा भतृहरि का जीवनवृत्त एवं किंवदंतियां-भर्थरी गाायन विधा की वर्तमान स्थिति ’’
राजा भतृहरि एक महान संस्कृत के कवि थे। संस्कृत साहित्य के इतिहास में भतृहरि एक नीतिकार के रूप में प्रसिद्ध हैं। इनके शतकत्रय (नीतिशतक, श्रृंगार शतक, वैराग्य शतक) की उपदेशात्मक कहानियां भारतीय जनमानस को विशेष रूप से प्रभावित करती हैं। प्रत्येक शतक में सौ-सौ श्लोक हैं। बाद में इन्होंने गुरू गोरखनाथ के शिष्य बनकर वैराग्य धारण कर लिया था इसलिए इनका एक लोकप्रचलित नाम बाबा भरथरी भी है।
जनश्रुति और परम्परा के अनुसार भर्तृहरि विक्रमसंवत् के प्रवर्तक सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के अग्रज माने जाते हैं। विक्रमसंवत् ईसवी सन् से 56 वर्ष पूर्व प्रारम्भ होता हैए जो विक्रमादित्य के प्रौढ़ावस्था का समय रहा होगा। भर्तृहरि विक्रमादित्य के अग्रज थे अतः इनका समय कुछ और पूर्व रहा होगा। विक्रमसंवत् के प्रारम्भ के विषय में भी विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ लोग ईसवी सन् 78 और कुछ लोग ईसवी सन् 544 में इसका प्रारम्भ मानते हैं। ये दोनों मत भी अग्राह्य प्रतीत होते हैं।
फारसी ग्रंथ कलितौ दिमनः में पंचतंत्र का एक पद्य शशिदिवाकर योर्ग्र पीडन का भाव उद्धृत है। पंचतंत्र में अनेक ग्रंथों के पद्यों का संकलन है। संभवतः पंचतंत्र में इसे नीति शतक से ग्रहण किया गया होगा। फारसी ग्रंथ 571 ईसवी से 581 ई० के एक फारसी शासक के निमित्त निर्मित हुआ था। इसलिए राजा भर्तृहरि अनुमानतः 550 ई० से पूर्व हम लोगों के बीच आए थे। भर्तृहरि उज्जयिनी के राजा थे। ये विक्रमादित्य उपाधि धारण करने वाले चन्द्रगुप्त द्वितीय के बड़े भाई थे।
इनके पिता का नाम चन्द्रसेन था। पत्नी का नाम पिंगला था जिसे वे अत्यन्त प्रेम करते थे। इन्होंने सुन्दर और रसपूर्ण भाषा में नीतिए वैराग्य तथा शृंगार जैसे गूढ़ विषयों पर शतक.काव्य लिखे हैं। इस शतक के अतिरिक्त वाक्यपदीय नामक एक उच्च श्रेणी का व्याकरण ग्रन्थ भी इनके नाम पर प्रसिद्ध है। कुछ लोग भट्टिकाव्य के रचयिता भट्टि से भी उनका एक्य मानते हैं। ऐसा कहा जाता है कि नाथपंथ के वैराग्य नामक उपपंथ के यह ही प्रवर्तक थे। चीनी यात्री इत्सिंग और ह्वेनसांग के अनुसार इन्होंने बौद्ध धर्म ग्रहण किया था।
एक बार राजा भर्तृहरि अपनी पत्नी पिंगला के साथ जंगल में शिकार खेलने के लिए गए हुए थे। वहां काफी समय तक भटकते रहने के बाद भी उन्हें कोई शिकार नहीं मिला। निराश पति.पत्नी जब घर लौट रहे थेए तभी रास्ते में उन्हें हिरनों का एक झुण्ड दिखाई दिया। जिसके आगे एक मृग चल रहा था। भर्तृहरि ने उस पर प्रहार करना चाहा तभी पिंगला ने उन्हें रोकते हुए अनुरोध किया कि महाराजए यह मृगराज 700 हिरनियों का पति और पालनकर्ता है।
इसलिए आप उसका शिकार न करें। भर्तृहरि ने पत्नी की बात नहीं मानी और हिरन पर बाण चला दिया। इससे वह मरणासन्न होकर भूमि पर गिर पड़ा। प्राण छोड़ते.छोड़ते हिरन ने राजा भर्तृहरि से कहा तुमने यह ठीक नहीं किया। अब जो मैं कहता हूं उसका पालन करो। मेरी मृत्यु के बाद मेरे सींग श्रृंगी बाबा कोए मेरे नेत्र चंचल नारी को मेरी त्वचा साधु.संतों कोए मेरे पैर भागने वाले चोरों को और मेरे शरीर की मिट्टी पापी राजा को दे देना। मरणासन्न हिरन की करुणामयी बातें सुनकर भर्तृहरि का हृदय द्रवित हो उठा। हिरन का कलेवर घोड़े पर लाद कर वह मार्ग में चलने लगे। रास्ते में उनकी मुलाकात बाबा गोरखनाथ से हुई। भर्तृहरि ने इस घटना से अवगत कराते हुए उनसे हिरन को जीवित करने की प्रार्थना की। इस पर बाबा गोरखनाथ ने कहा. मैं एक शर्त पर इसे जीवनदान दे सकता हूं कि इसके जीवित हो जाने पर तुम्हें मेरा शिष्य बनना पड़ेगा। राजा ने गोरखनाथ की बात मान ली।
काव्य शैली
भर्तृहरि संस्कृत मुक्तककाव्य परम्परा के अग्रणी कवि हैं। इन्हीं तीन शतकों के कारण उन्हें एक सफल और उत्तम कवि माना जाता है। इनकी भाषा सरलए मनोरमए मधुर रस पूर्ण तथा प्रवाहमयी है। भावाभिव्यक्ति इतनी सशक्त है कि वह पाठक के हृदय और मन दोनों को प्रभावित करती है। उनके शतकों में छन्दों की विविधता है। भाव और विषय के अनुकूल छन्द का प्रयोग विषय के अनुरुप उदाहरण आदि से उनकी सूक्तियाँ जन.जन में प्रचलित रही हैं और समय.समय पर जीवन में मार्गदर्शन और प्रेरणा देती रही हैं।
संघर्ष
प्रत्यक्ष अनुमान और शब्दए ये तीन प्रमाण अर्थात् सत्य ज्ञान के साधन हैं। प्रायरू सभी प्राचीन भारतीय दार्शनिकों ने ये तीनों प्रमाण माने हैं। जिस विषय में तीनों प्रमाणों का संवाद है उस विषय में निर्णय लेना सरल बात हैए जैसे की अग्नि ठडंक को नष्ट करती है। सूर्य चराचर सृष्टि हैश्ए सत्य में सारा विश्व प्रतिष्ठित स्थिर है इत्यादि। परन्तु जिस विषय के बारे में प्रमाणों में विरोध उत्पन्न हाता है। उसके बारे में कौन.सा प्रमाण सबल और कौन सा दुर्बल है यह समस्या बड़ी ही कठिन है। ऐसे विषय में भर्तृहरि का कथन इस प्रकार है. प्रत्यक्ष और अनुमानए ये दो प्रमाण व्यावहारिक व्यक्त विषयों के बारे में कुछ सीमा तक ज़रूर निर्णायक होंगे अर्थात् स्वीकार्य भी होंगे परन्तु अत्यन्त सूक्ष्म पारमार्थिक विषयों में इन प्रमाणों को बिल्कुल स्थान नहीं देना चाहिए। उन सूक्ष्म विषयों का निर्णय केवल अपौरुषेय वेद रूप शब्द प्रमाण से ही संभव है।
प्रत्यक्ष प्रमाण
प्रत्यक्ष प्रमाण से केवल स्थूल और वर्तमानकालीन पदार्थ का ही ज्ञान होता है। सूक्ष्म भूतकालीन भविष्यकालीन और दूरस्थ वस्तुओं के बारे में वह प्रमाण पूर्णतया निरुपयोगी है। समूचे विश्व का मूल कारण क्या है विश्व का और उसके कारण का सत्य स्वरूप क्या है। इस विषय में तथा धर्मए अधर्मए पापए पुण्यए परलोक साध शब्द और असाधु शब्द अपभ्रंश आदि परोक्ष विषयों में वह प्रमाण सर्वथा दुर्बल है। यह सारे प्राचीन शास्त्रकारों की निर्विवाद मान्यता है। इसलिए भर्तृहरि ने प्रत्यक्ष का समर्थन या निराकरण कुछ भी नहीं किया है। सिर्फ़ एक दो स्थानों पर उसने उसका उल्लेख किया है। अनुमान प्रमाण भी प्रत्यक्षावलंबी ही है। इस कारण से सर्वथा अप्रत्यक्षए अत्यन्त सूक्ष्म और जिस विषय का प्रत्यक्ष के साथ दूर से भी संबंध नहीं हो सकताए ऐसे विषय में अनुमान प्रमाण से निर्णय लेना अनर्थकारी होगा। ऐसा सिद्धांत भर्तृहरि ने स्पष्ट रूप से बताया है।
भर्तृहरि राजा विक्रमादित्य उपाधि धारण करने वाले चन्द्रगुप्त द्वितीय के बडे भाई थे तथा उज्जैन के शासक थे जिन्होंने माया मोह त्यागकर जंगल में तपस्या की। राजा भर्तृहरि अनुमानतः 550 ई० से पूर्व हम लोगों के बीच आए थे। इनके पिता का नाम चन्द्रसेन था। पत्नी का नाम पिंगला था जिसे वे अत्यन्त प्रेम करते थे।
जीवन चरित. जनश्रुति और परम्परा के अनुसार भर्तृहरि विक्रम संवत् के प्रवर्तक सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के अग्रज माने जाते हैं। विक्रमसंवत् ईसवी सन् से 56 वर्ष पूर्व प्रारम्भ होता है जो विक्रमादित्य के प्रौढ़ावस्था का समय रहा होगा। भर्तृहरि विक्रमादित्य के अग्रज थेए अतः इनका समय कुछ और पूर्व रहा होगा। विक्रमसंवत् के प्रारम्भ के विषय में भी विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ लोग ईसवी सन् 78 और कुछ लोग ईसवी सन् 544 में इसका प्रारम्भ मानते हैं। ये दोनों मत भी अग्राह्य प्रतीत होते हैं।
फारसी ग्रंथ कलितौ दिमनः में पंचतंत्र का एक पद्य शशि दिवाकर योर्ग्रहपीडनम्श का भाव उद्धृत है। पंचतंत्र में अनेक ग्रंथों के पद्यों का संकलन है। संभवतः पंचतंत्र में इसे नीतिशतक से ग्रहण किया गया होगा। फारसी ग्रंथ 571 ईसवी से 581 ई० के एक फारसी शासक के निमित्त निर्मित हुआ था। इसलिए राजा भर्तृहरि अनुमानतः 550 ई० से पूर्व हम लोगों के बीच आए थे। भर्तृहरि उज्जयिनी के राजा थे। ये विक्रमादित्य उपाधि धारण करने वाले चन्द्रगुप्त द्वितीय के बड़े भाई थे। इनके पिता का नाम चन्द्रसेन था।
पत्नी का नाम पिंगला था जिसे वे अत्यन्त प्रेम करते थे। इन्होंने सुन्दर और रसपूर्ण भाषा में नीति वैराग्य तथा श्रृंगार जैसे गूढ़ विषयों पर शतक.काव्य लिखे हैं। इस शतक के अतिरिक्त वाक्यपदीय नामक एक उच्च श्रेणी का व्याकरण ग्रन्थ भी इनके नाम पर प्रसिद्ध है। कुछ लोग भट्टिकाव्य के रचयिता भट्टि से भी उनका एक्य मानते हैं। ऐसा कहा जाता है कि नाथपंथ के वैराग्य नामक उपपंथ के यह ही प्रवर्तक थे। चीनी यात्री इत्सिंग और ह्वेनसांग के अनुसार इन्होंने बौद्ध धर्म ग्रहण किया था।
परंतु अन्य सूत्रों के अनुसार ये अद्वैत वेदान्ताचार्य थे। चीनी यात्री इत्सिंग के यात्रा विवरण से यह ज्ञात होता है कि 651 ईस्वी में भर्तृहरि नामक एक वैयाकरण की मृत्यु हुई थी। इस प्रकार इनका काल सातवीं शताब्दी का प्रतीत होता है परन्तु भारतीय पुराणों में इनके सम्बन्ध में उल्लेख होने से संकेत मिलता है कि इत्सिंग द्वारा वर्णित भर्तृहरि कोई अन्य रहे होंगे। महाराज भर्तृहरि निःसन्देह विक्रमसंवत की पहली सदी से पूर्व में उपस्थित थे। वे उज्जैन के अधिपति थे। उनके पिता महाराज गन्धर्वसेन बहुत योग्य शासक थे। उनके दो विवाह हुए। पहले से विवाह से महाराज भर्तृहरि और दूसरे से महाराज विक्रमादित्य हुए थे।
पिता की मृत्यु के बाद भर्तृहरि ने राजकार्य संभाला। विक्रम के सबल कन्धों पर शासन भार देकर वह निश्चिन्त हो गए। उनका जीवन कुछ विलासी हो गया था। वह असाधारण कवि और राजनीतिज्ञ थे। इसके साथ ही संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे। उन्होंने अपने पाण्डित्य और नीतिज्ञता और काव्य ज्ञान का सदुपयोग श्रृंगार और नीतिपूर्ण रचना से साहित्य संवर्धन में किया। विक्रमादित्य ने उनकी विलासी मनोवृत्ति के प्रति विद्रोह किया। देश उस समय विदेशी आक्रमण से भयाक्रान्त था।
पहले तो राजा भर्तृहरि ने अपने भाई विक्रमादित्य को राज्य से निर्वासित कर दियाए लेकिन समय सबसे ज्यादा शक्तिशाली होता है। विधाता ने भर्तृहरि के भाल में योग.लिपि लिखी थी। एक दिन जब उन्हें पूर्ण रूप से पता चला कि जिस रानी पिंगला को वह अपने प्राणों से भी प्रिय समझते थे वह कोतवाल के प्रेम में डूबी हैए उन्हें वैराग्य हो गया। वह अपार वैभव का त्याग करके उसी क्षण राजमहल से बाहर निकल पड़े।
इस संसार की मायामोह को त्याग कर भर्तृहरि वैरागी हो गए और राज.पाट छोड़ कर गुरु गोरखनाथ की शरण में चले गए। उसके बाद ही उन्होंने वहीं वैराग्य पर 100 श्लोक लिखेए जो कि वैराग्य शतक के नाम से प्रसिद्ध हैं। उससे पहले अपने शासनकाल में वे श्रृंगार शतक और नीति शतक नामक दो संस्कृत काव्य लिख चुके थे। पाठक जान लें कि ये तीनों शतक आज भी उपलब्ध हैं और पठनीय हैं।
उन्हें विश्वास हो गया कि विषय.भोग में रोग का भय हैए धन में राज्य काए शास्त्र में विवाद काए गुण में दुर्जन काए शरीर में मृत्यु का। यों संसार की सभी वस्तुएं भयावह हैंए केवल वैराग्य ही श्रेष्ठ और अमर अभय है। तब उनके श्रृगार और नीतिपरक जीवन में वैराग्य का समावेश हो गया। उनके अधरों पर शिव नाम का वास हो गया तृष्णा और वासना ने त्याग और तपस्या की चरम विशेषता सिद्ध की। उन्होंने अपने आत्मा में परमात्मा की व्याप्ति पाई ब्रह्मानुभूति की वेदान्त के सत्य का वरण किया। उन्होंने अपने आपको धिक्काराए कि आज तक प्रेम वासना और विषयों ने हमें ही भोग डाला है।
हमने तप नहीं कियाए तपों ने ही हमको तपा डाला है। काल का अन्त नहीं हुआए उसी ने हमारा अन्त कर डाला है। हम जीर्ण हो चलेए पर तृष्णा का अभाव नहीं हुआ। उनका जीवन साधनमय और ज्ञानपूर्ण हो उठा। उन्होंने शिवतत्त्व की प्राप्ति की। ज्ञानोदय ने शिव के रूप में उन्हे शान्ति का अधिकारी बनाया। संसार के आघात.प्रतिघात से दूर रहकर उन्होंने ब्रह्म के शिव रूप की साधना की। उन्होंने दसों दिशाओं और तीनों कालों में परिपूर्ण अनन्त चैतन्य स्वरूप अनुभवगम्य शान्त और तेजोमय ब्रह्म की उपासना की। विरक्ति ही उनकी एकमात्र संगिनी हो चली। महादेव ही उनके एकमात्र देव थे। वह भक्ति की भागीरथी में गोते लगाने लगे।
वास्तव में यही इस संसार की वास्तविकता है। एक व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति से प्रेम करता है और चाहता है कि वह व्यक्ति भी उसे उतना ही प्रेम करे। परंतु विडंबना यह है कि वह दूसरा व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति से प्रेम करता है। इसका कारण यह है कि संसार व इसके सभी प्राणी अपूर्ण है सबमें कुछ न कुछ कमी है। सिर्फ एक ईश्वर ही पूर्ण है। एक वही है जो हर जीव से उतना ही प्रेम करता हैए जितना जीव उससे करता है। इसलिए हमें प्रेम ईश्वर से ही करनी चाहिए। सही वक्त पर यही सोच राजा भर्तृहरि को गुरु गोरखनाथ के आश्रय में ले गई।
योगिराज भर्तृहरि का पवित्र नाम अमरफल खाए बिना अमर हो गया। उनका हृदय परिवर्तन इस बात का ज्वलन्त प्रतीक है। वह त्यागए वैराग्य और तपके प्रतिनिधि थे। हिमालय से कन्याकुमारी तक उनकी रचनाएं जीवनगाथा भिन्न.भिन्न भाषाओं मे योगियों और वैरागियों द्वारा अनिश्चित काल से गाई जा रही हैं और भविष्य में भी बहुत दिनों तक यही क्रम चलता रहेगा।
राजा भर्तृहरि का अन्तिम समय राजस्थान में बीता। उनकी समाधि अलवर राज्य के एक सघन वन में आज भी विद्यमान है। उसके सातवें दरवाज़े पर एक अखण्ड दीपक जलता रहता है। उसे भर्तृहरि की ज्योति स्वीकार किया जाता है। भर्तृहरि महान् शिवभक्त और सिद्ध योगी थे और अपने भाई विक्रमादित्य को पुनः स्थापित कर अमर हो गए। विक्रमादित्य उनकी तरह ही चक्रवर्ती निकले और उनके सुशासनकाल में विक्रम संवत की स्थापना हुईए जिसका शुभारंभ आज भी चैत्रमास के नवरात्र से आरंभ होता है। राजा भर्तृहरि हमेशा के लिए अपने वैराग्यभाव से ब्रह्म स्वरूप दुनिया में अपनी काव्य कृतियों की रचनाओं से अमर हो गए। इस संदर्भ में कृष्ण भगवान ने अपने प्रिय पात्र की व्याख्या करते हुए गीता में कहा है.जो पुरुष आकांक्षा से रहितए अंदर.बाहर से शुद्ध दक्ष पक्षपात से रहित और दुःखों से छूटा हुआ हैए सबी आसक्तियों का त्यागी वही व्यक्ति मेरा भक्त है और मुझे प्रिय है।
काव्य रचना
1. अपने जीवन काल में उन्होंने श्रृंगार नीति शास्त्रों की तो रचना की ही थी अब उन्होंने वैराग्य शतक की रचना भी कर डाली और विषय वासनाओं की कटु आलोचना की। इन तीन काव्य शतकों के अलावा व्याकरण शास्त्र का परम प्रसिद्ध ग्रन्थ वाक्यपदीय भी उनके महान् पाण्डित्य का परिचायक है। वह शब्द विद्या के मौलिक आचार्य थे। शब्द शास्त्र ब्रह्मा का साक्षात् रुप है। अतएव वे शिवभक्त होने के साथ.साथ ब्रह्म रूपी शब्दभक्त भी थे। शब्द ब्रह्म का ही अर्थ रुप नानात्मक जगत.विवर्त है। योगीजन शब्द ब्रह्म से तादात्म्य हो जाने को ही मोक्ष मानते हैं। भर्तृहरि शब्द ब्रह्म के योगी थे। उनका वैराग्य दर्शन परमात्मा के साक्षात्कार का पर्याय है। सह कारण है कि आज भी शब्दो की दुनिया के रचनाकार सदा के अमर हो जाते है।
2. भर्तृहरि एक महान् संस्कृत कवि थे। संस्कृत साहित्य के इतिहास में भर्तृहरि एक नीतिकार के रूप में प्रसिद्ध हैं। इनके शतक ; नीतिशतक श्रृंगारशतक वैराग्यशतक की उपदेशात्मक कहानियां भारतीय जनमानस को विशेष रूप से प्रभावित करती हैं। प्रत्येक शतक में सौ.सौ श्लोक हैं। बाद में इन्होंने गुरु गोरखनाथ का शिष्य बनकर वैराग्य धारण कर लिया थाए इसलिए इनका एक लोक प्रचलित नाम बाबा गोपीचन्द भरथरी भी है।
3. भर्तृहरि संस्कृत मुक्तक काव्य परम्परा के अग्रणी कवि हैं। इन्हीं तीन शतकों के कारण उन्हें एक सफल और उत्तम कवि माना जाता है। इनकी भाषा सरलए मनोरमए मधुर और प्रवाहमयी है। भावाभिव्यक्ति इतनी सशक्त है कि वह पाठक के हृदय और मन दोनों को प्रभावित करती है। उनके शतकों में छन्दों की विविधता है। भाव और विषय के अनुकूल छन्द का प्रयोग विषय के अनुरुप उदाहरण आदि से उनकी सूक्तियां जन.जन में प्रचलित रही हैं और समय.समय पर जीवन में मार्गदर्शन और प्रेरणा देती रही हैं।
4. भर्तृहरि ‚ राजाद्ध .भर्तृहरि राजा विक्रमादित्य उपाधि धारण करने वाले चन्द्रगुप्त द्वितीय के बडे भाई थे तथा उज्जैन के शासक थे जिन्होंने माया मोह त्यागकर जंगल में तपस्या की। राजा भर्तृहरि अनुमानतः 550 ई० से पूर्व हम लोगों के बीच आए थे। इनके पिता का नाम चन्द्रसेन था। पत्नी का नाम पिंगला था जिसे वे अत्यन्त प्रेम करते थे।
जीवन चरित
जनश्रुति और परम्परा के अनुसार भर्तृहरि विक्रमसंवत् के प्रवर्तक सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के अग्रज माने जाते हैं। विक्रमसंवत् ईसवी सन् से 56 वर्ष पूर्व प्रारम्भ होता हैए जो विक्रमादित्य के प्रौढ़ावस्था का समय रहा होगा। भर्तृहरि विक्रमादित्य के अग्रज थेए अतः इनका समय कुछ और पूर्व रहा होगा। विक्रमसंवत् के प्रारम्भ के विषय में भी विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ लोग ईसवी सन् 78 और कुछ लोग ईसवी सन् 544 में इसका प्रारम्भ मानते हैं। ये दोनों मत भी अग्राह्य प्रतीत होते हैं। फारसी ग्रंथ कलितौ दिमनः में पंचतंत्र का एक पद्य शशिदिवाकर योर्ग्रहपीडनम्श का भाव उद्धृत है।
पंचतंत्र में अनेक ग्रंथों के पद्यों का संकलन है। संभवतः पंचतंत्र में इसे नीतिशतक से ग्रहण किया गया होगा। फारसी ग्रंथ 571 ईसवी से 581 ई० के एक फारसी शासक के निमित्त निर्मित हुआ था। इसलिए राजा भर्तृहरि अनुमानतः 550 ई० से पूर्व हम लोगों के बीच आए थे। भर्तृहरि उज्जयिनी के राजा थे। ये विक्रमादित्य उपाधि धारण करने वाले चन्द्रगुप्त द्वितीय के बड़े भाई थे। इनके पिता का नाम चन्द्रसेन था। पत्नी का नाम पिंगला था जिसे वे अत्यन्त प्रेम करते थे। इन्होंने सुन्दर और रसपूर्ण भाषा में नीतिए वैराग्य तथा श्रृंगार जैसे गूढ़ विषयों पर शतक.काव्य लिखे हैं। इस शतक के अतिरिक्तए वाक्यपदीय नामक एक उच्च श्रेणी का व्याकरण ग्रन्थ भी इनके नाम पर प्रसिद्ध है।
कुछ लोग भट्टिकाव्य के रचयिता भट्टि से भी उनका एक्य मानते हैं। ऐसा कहा जाता है कि नाथपंथ के वैराग्य नामक उपपंथ के यह ही प्रवर्तक थे। चीनी यात्री इत्सिंग और ह्वेनसांग के अनुसार इन्होंने बौद्ध धर्म ग्रहण किया था। परंतु अन्य सूत्रों के अनुसार ये अद्वैत वेदान्ताचार्य थे। चीनी यात्री इत्सिंग के यात्रा विवरण से यह ज्ञात होता है कि 651 ईस्वी में भर्तृहरि नामक एक वैयाकरण की मृत्यु हुई थी। इस प्रकार इनका काल सातवीं शताब्दी का प्रतीत होता है।
परन्तु भारतीय पुराणों में इनके सम्बन्ध में उल्लेख होने से संकेत मिलता है कि इत्सिंग द्वारा वर्णित भर्तृहरि कोई अन्य रहे होंगे। महाराज भर्तृहरि निःसन्देह विक्रमसंवत की पहली सदी से पूर्व में उपस्थित थे। वे उज्जैन के अधिपति थे। उनके पिता महाराज गन्धर्वसेन बहुत योग्य शासक थे। उनके दो विवाह हुए। पहले से विवाह से महाराज भर्तृहरि और दूसरे से महाराज विक्रमादित्य हुए थे। पिता की मृत्यु के बाद भर्तृहरि ने राजकार्य संभाला। विक्रम के सबल कन्धों पर शासनभार देकर वह निश्चिन्त हो गए। उनका जीवन कुछ विलासी हो गया था। वह असाधारण कवि और राजनीतिज्ञ थे। इसके साथ ही संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे।
उन्होंने अपने पाण्डित्य और नीतिज्ञता और काव्य ज्ञान का सदुपयोग श्रृंगार और नीतिपूर्ण रचना से साहित्य संवर्धन में किया। विक्रमादित्य ने उनकी विलासी मनोवृत्ति के प्रति विद्रोह किया। देश उस समय विदेशी आक्रमण से भयाक्रान्त था। पहले तो राजा भर्तृहरि ने अपने भाई विक्रमादित्य को राज्य से निर्वासित कर दियाए लेकिन समय सबसे ज्यादा शक्तिशाली होता है। विधाता ने भर्तृहरि के भाल में योग.लिपि लिखी थी। एक दिन जब उन्हें पूर्ण रूप से पता चला कि जिस रानी पिंगला को वह अपने प्राणों से भी प्रिय समझते थेए वह कोतवाल के प्रेम में डूबी हैए उन्हें वैराग्य हो गया। वह अपार वैभव का त्याग करके उसी क्षण राजमहल से बाहर निकल पड़े।
वैराग्य दर्शन. इस संसार की मायामोह को त्याग कर भर्तृहरि वैरागी हो गए और राज.पाट छोड़ कर गुरु गोरखनाथ की शरण में चले गए। उसके बाद ही उन्होंने वहीं वैराग्य पर 100 श्लोक लिखे जो कि वैराग्य शतक के नाम से प्रसिद्ध हैं। उससे पहले अपने शासनकाल में वे श्रृंगार शतक और नीति शतक नामक दो संस्कृत काव्य लिख चुके थे। पाठक जान लें कि ये तीनों शतक आज भी उपलब्ध हैं और पठनीय हैं।
उन्हें विश्वास हो गया कि विषय.भोग में रोग का भय है धन में राज्य काए शास्त्र में विवाद का गुण में दुर्जन काए शरीर में मृत्यु का। यों संसार की सभी वस्तुएं भयावह हैं।
केवल वैराग्य ही श्रेष्ठ और अमर अभय है। तब उनके श्रृगार और नीतिपरक जीवन में वैराग्य का समावेश हो गया। उनके अधरों पर शिव नाम का वास हो गयाए तृष्णा और वासना ने त्याग और तपस्या की चरम विशेषता सिद्ध की। उन्होंने अपने आत्मा में परमात्मा की व्याप्ति पाईए ब्रह्मानुभूति कीए वेदान्त के सत्य का वरण किया। उन्होंने अपने आपको धिक्कारा कि आज तक प्रेम वासना और विषयों ने हमें ही भोग डाला है। हमने तप नहीं कियाए तपों ने ही हमको तपा डाला है। काल का अन्त नहीं हुआ उसी ने हमारा अन्त कर डाला है। हम जीर्ण हो चलेए पर तृष्णा का अभाव नहीं हुआ। उनका जीवन साधनमय और ज्ञानपूर्ण हो उठा।
उन्होंने शिवतत्त्व की प्राप्ति की। ज्ञानोदय ने शिव के रूप में उन्हे शान्ति का अधिकारी बनाया। संसार के आघात.प्रतिघात से दूर रहकर उन्होंने ब्रह्म के शिव रूप की साधना की। उन्होंने दसों दिशाओं और तीनों कालों में परिपूर्णए अनन्त चैतन्य स्वरूप अनुभवगम्यए शान्त और तेजोमय ब्रह्म की उपासना की। विरक्ति ही उनकी एकमात्र संगिनी हो चली। महादेव ही उनके एकमात्र देव थे। वह भक्ति की भागीरथी में गोते लगाने लगे।
वास्तव में यही इस संसार की वास्तविकता है। एक व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति से प्रेम करता है और चाहता है कि वह व्यक्ति भी उसे उतना ही प्रेम करे। परंतु विडंबना यह है कि वह दूसरा व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति से प्रेम करता है। इसका कारण यह है कि संसार व इसके सभी प्राणी अपूर्ण हैंए सबमें कुछ न कुछ कमी है। सिर्फ एक ईश्वर ही पूर्ण है। एक वही है जो हर जीव से उतना ही प्रेम करता हैए जितना जीव उससे करता है। इसलिए हमें प्रेम ईश्वर से ही करनी चाहिए। सही वक्त पर यही सोच राजा भर्तृहरि को गुरु गोरखनाथ के आश्रय में ले गई।
योगिराज भर्तृहरि का पवित्र नाम अमरफल खाए बिना अमर हो गया। उनका हृदय परिवर्तन इस बात का ज्वलन्त प्रतीक है। वह त्यागए वैराग्य और तपके प्रतिनिधि थे। हिमालय से कन्याकुमारी तक उनकी रचनाएं जीवनगाथा भिन्न.भिन्न भाषाओं मे योगियों और वैरागियों द्वारा अनिश्चित काल से गाई जा रही हैं और भविष्य में भी बहुत दिनों तक यही क्रम चलता रहेगा।
अन्तिम समय. राजा भर्तृहरि का अन्तिम समय राजस्थान में बीता। उनकी समाधि अलवर राज्य के एक सघन वन में आज भी विद्यमान है। उसके सातवें दरवाज़े पर एक अखण्ड दीपक जलता रहता है। उसे भर्तृहरि की ज्योति स्वीकार किया जाता है। भर्तृहरि महान् शिवभक्त और सिद्ध योगी थे और अपने भाई विक्रमादित्य को पुनः स्थापित कर अमर हो गए। विक्रमादित्य उनकी तरह ही चक्रवर्ती निकले और उनके सुशासनकाल में विक्रम संवत की स्थापना हुईए जिसका शुभारंभ आज भी चैत्रमास के नवरात्र से आरंभ होता है। राजा भर्तृहरि हमेशा के लिए अपने वैराग्यभाव से ब्रह्म स्वरूप दुनिया में अपनी काव्य कृतियों की रचनाओं से अमर हो गए। इस संदर्भ में कृष्ण भगवान ने अपने प्रिय पात्र की व्याख्या करते हुए गीता में कहा है. जो पुरुष आकांक्षा से रहित अंदर.बाहर से शुद्ध दक्ष पक्षपात से रहित और दुःखों से छूटा हुआ है सबी आसक्तियों का त्यागी वही व्यक्ति मेरा भक्त है और मुझे प्रिय है।
काव्य रचना
1 . अपने जीवन काल में उन्होंने श्रृंगार नीति शास्त्रों की तो रचना की ही थीए अब उन्होंने वैराग्य शतक की रचना भी कर डाली और विषय वासनाओं की कटु आलोचना की। इन तीन काव्य शतकों के अलावा व्याकरण शास्त्र का परम प्रसिद्ध ग्रन्थ वाक्यपदीय भी उनके महान् पाण्डित्य का परिचायक है। वह शब्द विद्या के मौलिक आचार्य थे। शब्द शास्त्र ब्रह्मा का साक्षात् रुप है। अतएव वे शिवभक्त होने के साथ.साथ ब्रह्म रूपी शब्दभक्त भी थे। शब्द ब्रह्म का ही अर्थ रुप नानात्मक जगत.विवर्त है। योगीजन शब्द ब्रह्म से तादात्म्य हो जाने को ही मोक्ष मानते हैं। भर्तृहरि शब्द ब्रह्म के योगी थे। उनका वैराग्य दर्शन परमात्मा के साक्षात्कार का पर्याय है। सह कारण है कि आज भी शब्दो की दुनिया के रचनाकार सदा के अमर हो जाते है।
2. भर्तृहरि एक महान् संस्कृत कवि थे। संस्कृत साहित्य के इतिहास में भर्तृहरि एक नीतिकार के रूप में प्रसिद्ध हैं। इनके शतकत्रय ;नीतिशतकए श्रृंगारशतकए वैराग्यशतक द्ध की उपदेशात्मक कहानियां भारतीय जनमानस को विशेष रूप से प्रभावित करती हैं। प्रत्येक शतक में सौ.सौ श्लोक हैं। बाद में इन्होंने गुरु गोरखनाथ का शिष्य बनकर वैराग्य धारण कर लिया थाए इसलिए इनका एक लोक प्रचलित नाम बाबा गोपीचन्द भरथरी भी है।
3 .भर्तृहरि संस्कृत मुक्तक काव्य परम्परा के अग्रणी कवि हैं। इन्हीं तीन शतकों के कारण उन्हें एक सफल और उत्तम कवि माना जाता है। इनकी भाषा सरलए मनोरमए मधुर और प्रवाहमयी है। भावाभिव्यक्ति इतनी सशक्त है कि वह पाठक के हृदय और मन दोनों को प्रभावित करती है। उनके शतकों में छन्दों की विविधता है। भाव और विषय के अनुकूल छन्द का प्रयोग विषय के अनुरुप उदाहरण आदि से उनकी सूक्तियां जन.जन में प्रचलित रही हैं और समय.समय पर जीवन में मार्गदर्शन और प्रेरणा देती रही हैं।
भर्तृहरि का मन्दिर. राजस्थान के अलवर मे भर्तृहरि का मन्दिर है जिसे भारतीय पुरातत्व विभाग ने संरक्षित स्मारक घोषित किया है यह अलवर शहर से 32 किमी दूर जयपुर अलवर मार्ग पर स्थित है यहाँ भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की सप्तमी और अष्टमी को मेला लगता है । नाथपंथ की अलख जगाने वाले कनफडे नाथ साधुओं के लिए इस तीर्थ की विशेष मान्यता है। आज अभी भी अलवर राजस्थान में भर्तृहरि की गुफा और गोपीचंद भरथरी की गुफा प्रसिद्ध है। किंवदन्तियां. इनके जीवन से सम्बन्धित कुछ किंवदन्तियां इस प्रकार है.
कथा.1
एक बार राजा भर्तृहरि अपनी पत्नी पिंगला के साथ जंगल में शिकार खेलने के लिए गए हुए थे। वहां काफ़ी समय तक भटकते रहने के बाद भी उन्हें कोई शिकार नहीं मिला। निराश पति.पत्नी जब घर लौट रहे थेए तभी रास्ते में उन्हें हिरनों का एक झुण्ड दिखाई दिया। जिसके आगे एक मृग चल रहा था। भर्तृहरि ने उस पर प्रहार करना चाहा तभी पिंगला ने उन्हें रोकते हुए अनुरोध किया कि महाराजए यह मृगराज 700 हिरनियों का पति और पालनकर्ता है। इसलिए आप उसका शिकार न करें। भर्तृहरि ने पत्नी की बात नहीं मानी और हिरन पर बाण चला दिया। इससे वह मरणासन्न होकर भूमि पर गिर पड़ा।
प्राण छोड़ते.छोड़ते हिरन ने राजा भर्तृहरि से कहा तुमसे यह ठीक नहीं किया। अब जो मैं कहता हूं उसका पालन करो। मेरी मृत्यु के बाद मेरे सींग श्रृंगी बाबा कोए मेरे नेत्र चंचल नारी कोए मेरी त्वचा साधु.संतों कोए मेरे पैर भागने वाले चोरों को और मेरे शरीर की मिट्टी पापी राजा को दे देना। मरणासन्न हिरन की करुणामयी बातें सुनकर भर्तृहरि का हृदय द्रवित हो उठा। हिरन का कलेवर घोड़े पर लाद कर वह मार्ग में चलने लगे। रास्ते में उनकी मुलाकात बाबा से हुई। भर्तृहरि ने इस घटना से अवगत कराते हुए उनसे हिरन को जीवित करने की प्रार्थना की। इस पर बाबा गोरखनाथ ने कहा. मैं एक शर्त पर इसे जीवनदान दे सकता हूं कि इसके जीवित हो जाने पर तुम्हें मेरा शिष्य बनना पड़ेगा। राजा ने गोरखनाथ की बात मान ली।
कथा.2
भारतीय वांगमय के अनुपम ग्रन्थ भविष्य पुराण से ज्ञात होता है कि राजा विक्रमादित्य का समय अत्यन्त सुख और समृद्धि का था। उस समय उनके राज्य में जयंत नाम का एक ब्राह्मण रहता था। घोर तपस्या के परिणाम स्वरूप उसे इन्द्र के यहां से एक फल की प्राप्ति हुई थीए जिसकी विशेषता यह थी कि कोई भी व्यक्ति उसे खा लेने के उपरान्त अमर हो सकता था। फल को पाकर ब्राह्मण अपने घर चला आया तथा उसे राजा भर्तृहरि को देने का निश्चय किया और उन्हें दे दिया।
कथा.3
एक अन्य अनुश्रुति के अनुसार भर्तृहरि विक्रमादित्य के बड़े भाई तथा भारत के प्रसिद्ध सम्राट थे। वे मालवा की राजधानी उज्जयिनी में न्याय पूर्वक शासन करते थे। उनकी एक रानी थी जिसका नाम पिंगला बताया जाता है। राजा उससे अत्यन्त प्रेम करते थेए जबकि वह महाराजा से अत्यन्त कपटपूर्ण व्यवहार करती थी। यद्यपि इनके छोटे भाई विक्रमादित्य ने राजा भर्तृहरि को अनेक बार सचेष्ट किया था तथापि राजा ने उसके प्रेम जाल में फंसे होने के कारण उसके क्रिया.कलापों पर ध्यान नहीं दिया था। उस अनुश्रुति के आधार पर यह संकेत मिलता है कि भर्तृहरि मालवा के निवासी तथा विक्रमादित्य के बड़े भाई थे।
भर्तृहरि की परीक्षा. उज्जयिनी ;उज्जैनद्ध के राजा भर्तृहरि से पास 365 पाकशास्त्री यानि रसोइए थेए जो राजा और उसके परिवार और अतिथियों के लिए भोजन बनाने के लिए। वर्ष में केवल एक.एक की बारी आती थी। 364 दिन वे ताकते रहते थे कि कब हमारी बारे आए और हम राजासाहब के लिए भोजन बनाएंए इनाम पाएं। लेकिन इस दौरान भर्तृहरि जब गुरु गोरखनाथ जी के चरणों में चले गये तो भिक्षा मांगकर खाने लगे थे। एक बार गुरु गोरखनाथजी ने अपने शिष्यों से कहा। देख्रो जा होकर भी इसने कामए क्रोध लोभ तथा अहंकार को जीत लिया है और दृढ़निश्चयी है। शिष्यों ने कहा
गुरूजी ! ये तो राजाधिराज हैं‚ इनके यहां 365 तो बावर्ची रहते थे। ऐसे भोग विलास के वातावरण में से आए हुए राजा और कैसे काम क्रोध लोभ रहित हो गए।
गुरु गोरखनाथ जी ने राजा भर्तृहरि से कहाए ष्भर्तृहरि! जाओए भंडारे के लिए जंगल से लकड़ियां ले आओ।श्
राजा भर्तृहरि नंगे पैर गएए जंगल से लकड़ियां एकत्रित करके सिर पर बोझ उठाकर ला रहे थे। गोरखनाथ जी ने दूसरे शिष्यों से कहा जाओ उसको ऐसा धक्का मारो कि बोझ गिर जाए।
चेले गए और ऐसा धक्का मारा कि बोझ गिर गया और भर्तृहरि भी गिर गए। भर्तृहरि ने बोझ उठायाए लेकिन न चेहरे पर शिकनए न आंखों में आग के गोलेए न होंठ फड़के। गुरु जी ने चेलों से कहा देखा ! भर्तृहरि ने क्रोध को जीत लिया है।
शिष्य बोलेए गुरूजी! अभी तो और भी परीक्षा लेनी चाहिए।
थोड़ा सा आगे जाते ही गुरुजी ने योगशक्ति से एक महल रच दिया। गोरखनाथ जी भर्तृहरि को महल दिखा रहे थे। युवतियां नाना प्रकार के व्यंजन आदि से सेवक उनका आदर सत्कार करने लगे। भर्तृहरि युवतियों को देखकर कामी भी नहीं हुए और उनके नखरों पर क्रोधित भी नहीं हुएए चलते ही गए। गोरखनाथजी ने शिष्यों को कहा। अब तो तुम लोगों को विश्वास हो ही गया है कि भर्तृहरि ने कामए क्रोध लोभ आदि को जीत लिया है। शिष्यों ने कहा गुरूदेव एक परीक्षा और लीजिए।
गोरखनाथजी ने कहा अच्छा भर्तृहरि! हमारा शिष्य बनने के लिए परीक्षा से गुजरना पड़ता है। जाओए तुमको एक महीना मरुभूमि में नंगे पैर पैदल यात्रा करनी होगी। भर्तृहरि अपने निर्दिष्ट मार्ग पर चल पड़े। पहाड़ी इलाका लांघते.लांघते राजस्थान की मरुभूमि में पहुंचे। धधकती बालूए कड़ाके की धूप मरुभूमि में पैर रखो तो बस जल जाए। एक दिनए दो दिन यात्रा करते.करते छह दिन बीत गए। सातवें दिन गुरु गोरखनाथजी अदृश्य शक्ति से अपने प्रिय चेलों को भी साथ लेकर वहां पहुंचे। गोरखनाथ जी बोले–
देखो यह भर्तृहरि जा रहा है। मैं अभी योगबल से वृक्ष खड़ा कर देता हूं। वृक्ष की छाया में भी नहीं बैठेगा।श् अचानक वृक्ष खड़ा कर दिया। चलते.चलते भर्तृहरि का पैर वृक्ष की छाया पर आ गया तो ऐसे उछल पड़ेए मानो अंगारों पर पैर पड़ गया हो।
ष्मरुभूमि में वृक्ष कैसे आ गयाघ् छायावाले वृक्ष के नीचे पैर कैसे आ गयाघ् गुरु जी की आज्ञा थी मरुभूमि में यात्रा करने की।ष् कूदकर दूर हट गए। गुरु जी प्रसन्न हो गए कि देखो! कैसे गुरु की आज्ञा मानता है। जिसने कभी पैर गलीचे से नीचे नहीं रखा वह मरुभूमि में चलते.चलते पेड़ की छाया का स्पर्श होने से अंगारे जैसा एहसास करता है।ष् गोरखनाथ जी दिल में चेले की दृढ़ता पर बड़े खुश हुए लेकिन और शिष्यों के मन में ईर्ष्या थी।
शिष्य बोले गुरूजी यह तो ठीक है लेकिन अभी तो परीक्षा पूरी नहीं हुई। गोरखनाथ जी ;रूप बदल करद्ध भर्तृहरि से मिले और बोलेए ष्जरा छाया का उपयोग कर लो। भर्तृहरि बोले। नहीं मेरे गुरुजी की आज्ञा है कि नंगे पैर मरुभूमि में चलूं। गोरखनाथ जी ने सोचाए ष्अच्छा! कितना चलते हो देखते हैं। थोड़ा आगे गए तो गोरखनाथ जी ने योगबल से कांटे पैदा कर दिए। ऐसी कंटीली झाड़ी कि कंथा ;फटे.पुराने कपड़ों को जोड़कर बनाया हुआ वस्त्रद्ध फट गया। पैरों में शूल चुभने लगेए फिर भी भर्तृहरि ने ष्आहष् तक नहीं की। भर्तृहरि तो और अंतर्मुख हो गए। यह सब सपना हैए गुरु जी ने जो आदेश दिया हैए वही तपस्या है। यह भी गुरुजी की कृपा है।
अंतिम परीक्षा के लिए गुरु गोरखनाथ जी ने अपने योगबल से प्रबल ताप पैदा किया। प्यास के मारे भर्तृहरि के प्राण कंठ तक आ गये। तभी गोरखनाथ जी ने उनके अत्यन्त समीप एक हरा.भरा वृक्ष खड़ा कर दिया जिसके नीचे पानी से भरी सुराही और सोने की प्याली रखी थी। एक बार तो भर्तृहरि ने उसकी ओर देखा पर तुरंत ख्याल आया कि कहीं गुरु आज्ञा भंग तो नहीं हो रही है। उनका इतना सोचना ही हुआ कि सामने से गोरखनाथ आते दिखाई दिए। भर्तृहरि ने दंडवत प्रणाम किया।
गुरुजी बोले शाबाश भर्तृहरि! वर मांग लो। अष्टसिद्धि दे दूं नवनिधि दे दूं। तुमने सुंदर.सुंदर व्यंजन ठुकरा दिएए युवतियां तुम्हारे चरण पखारने के लिए तैयार थींए लेकिन तुम उनके चक्कर में नहीं आए। तुम्हें जो मांगना हैए वो मांग लो।
भर्तृहरि बोले गुरूजीǃ बस आप प्रसन्न हैंए मुझे सब कुछ मिल गया। शिष्य के लिए गुरु की प्रसन्नता सब कुछ है। आप मुझसे संतुष्ट हुएए मेरे करोड़ों पुण्यकर्म और यज्ञ तप सब सफल हो गए।
गोरखनाथ बोलेए नहीं भर्तृहरि! अनादर मत करो। तुम्हें कुछ.न.कुछ तो लेना ही पड़ेगाए कुछ.न.कुछ मांगना ही पड़ेगा। इतने में रेती में एक चमचमाती हुई सूई दिखाई दी। उसे उठाकर भर्तृहरि बोलेए गुरूजी ! कंठा फट गया हैए सूई में यह धागा पिरो दीजिए ताकि मैं अपना कंठा सी लूं।
गोरखनाथ जी और खुश हुए कि ष्हद हो गई! कितना निरपेक्ष हैए अष्टसिद्धि.नवनिधियां कुछ नहीं चाहिए। मैंने कहा कुछ मांगोए तो बोलता है कि सूई में जरा धागा डाल दो। गुरु का वचन रख लिया। कोई अपेक्षा नहींघ् भर्तृहरि तुम धन्य हो गए! कहां उज्जयिनी का सम्राट नंगे पैर मरुभूमि में। एक महीना भी नहीं होने दियाए सात.आठ दिन में ही परीक्षा से उत्तीर्ण हो गए।

सुरूज बाई खांडे अउ छत्तीसगढ़ म भरथरी गायन. छत्तीसगढ़ म अइसन कई ठन लोक गाथा गायन के परंपरा हेए जेन कोनो न कोनो ऐतिहासिक पात्र मन ऊपर आधारित ग्रंथ या धर्मग्रंथ के मानक म गाये जाथे फेर ए ह शास्त्र ले लोक के कंठ म आवत.आवत अपन एक अलगेच स्वरूप धारण कर लेथे इहाँ के पंडवानी गायन विधा ल देख लेवौए मूल रूप ले वो ह महाभारत के प्रमुख पात्र पांडव मन ऊपर आधारित हेण् फेर ए विधा के प्रवर्तक नारायण प्रसाद वर्मा ह एला छत्तीसगढ़ी लोक गीत अउ संगीत मन संग समो के सबल सिंह चौहान के लिखे किताब ल एक अलगेच विधा के रूप म विकसित कर दिसण् ठउका अइसनेच राजा भृर्तृहरि के ऐतिहासिक कथा ल छत्तीसगढ़ी के लोक विधा म पिरो के भरथरी गायन के परंपरा विकसित करे गे हवयण्रायपुर के मोती बाग म पहिली हर बछर श्जगारश् कार्यक्रम के आयोजन होवयण् इहें मैं सबले पहिली सुरूज बाई खांडे के भरथरी गायन के प्रस्तुति देखे रेहेंवण् तब ओकर संग मुंहाचाही घलो करे रेहेंवण् तब वोमन बताए रिहिन हेंए के एकर कथा ल ओमन अपन बबा ;नानाद्ध जगा सुने रिहिन हेंण् सुरूज बाई बताए रिहिन हें. मैं पढ़े लिखे तो नइ हौंए फेर मोर नाना ह जेन बतावय अउ सिखोवय तेन मोला कंठस्थ हो जावत रिहिसेण् आगू चलके रेखादेवी जलक्षत्री अउ सफरी मरकाम ल घलो भरथरी गायन करत सुनेंवण् रेखादेवी जलक्षत्री अउ मोर गाँव तो आपस म जुड़े हेण् हमर मनके एक.दूसर के घर घलो आना.जाना होवत रहिथेण् रेखा घलो अइसने बताए रिहिसेए के सिरिफ सुन.सुन के ही ए गायन विधा ल सीखे हावयण् एकरे सेती उन सबो के गायन म लगभग एके असन शैली अउ शब्द देखे बर मिलथे.
घोड़ा रोवय घोड़ेसार मए घोड़ेसार म वोए
हाथी रोवय हाथीसार म
मोर रानी ये वोए महलों म रोवय
मोर रानी ये याए महलों म रोवय
एदे धरती म दिए लोटाए वोए ये लोटाए वोए भाई येदे जीण्ण्ण्
सुन लेबे नारी ये बाते लए मोर बाते ल याए का तो जवानी ये दिए हे
भगवाने ह वोए मोर कर्मे म न
भगवाने ह याए मोर कर्मे म न
येदे काये जोनी मोला दिए हेए येदे दिए हेए भाई येदे जी…
भरथरी के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि.के बारे म बताए जाथेए के परमार वंश के महान सम्राट विक्रमादित्य के बड़े भाई राजा भृर्तृहरि ह ए गाथा के मुख्य पात्र आयण् एला संस्कृत के महान कवि भर्तृहरि घलो माने जाथेण् अइसे बताए जाथेए के भरथरी कथा ह बिहारए उत्तर प्रदेश अउ बंगाल म पहिलिच ले प्रचलित रिहिसेए उही मन डहार ले होवत हे छत्तीसगढ़ आए हे। बताए जाथेए पहिली बंगाल के जोगी मन उज्जैन आवत.जावत राहंयण् छत्तीसगढ़ एकर मनके बीच म परयए तेकर सेती वोमन इहाँ ले नहाक के ही आवयं.जावयंए इही यात्रा के खातिर ए ह छत्तीसगढ़ म घलो अपन बसेरा बना डारिस वइसे भरथरी के इहाँ आए अउ एकर कथा प्रसंग के संबंध म अलग.अलग विद्वान मन के अलग.अलग विचार हे–
भरथरी एक अइसन चरित्र आयए जेकर संबंध म बहुत अकन किंवदंती घलो हेण् भरथरी योगी कइसे बनीसघ् वो तो उज्जैन के राजा रिहिसेण् फेर वो राजकाज ल छोड़ के काबर चल दिसघ् अलग.अलग कहानी हेण् फेर आखिर म गोरखनाथ जी के किरपा ले सब ठीक हो जाथेण् तब भरथरी ह गोरखनाथ के चेला बन जाथेण् एकरे सेती एकर एक लोक प्रचलित नांव बाबा भरथरी घलो हे।
छत्तीसगढ़ म भरथरी गायन के क्षेत्र म वइसे तो बहुत झन आवत रेहे हेंए फेर जेन लोकप्रियता अउ ऊंचाई सुरूज बाई खांडे ल मिलिसए अभी तक अउ दूसर मनला नइ मिल पाए हें।
सुरूज बाई खाडे के जनम 12 जून 1949 के बिलासपुर जिला के एक ग्रामीण परिवार म होए रिहिसेण् जब वो सात बछर के होइसए तभेच ले अपन बबा ;नानाद्ध रामसाय घृतलहरे के मार्गदर्शन म गाए ले धर लिए रिहिसे वोहर अपन नाना जगा ले भरथरी के संगे.संग ढोला.मारूए चंदैनी जइसन लोक गाथा मनला घलो सीखे रिहिसे
पहली बेर उनला रतनपुर मेला म गाये के मौका मिले रिहिसेए फेर रूस म सन् 1986.87 म होए श्भारत महोत्सव म उनला विशेष चिन्हारी अउ प्रसिद्धि मिलिसण् रूस के छोड़े करीब 18 अउ देश मनमा वोमन अपन कला के डंका बजाए रिहिन हेंण् जेकर सेती उनला दाऊ रामचंद्र देशमुख अउ स्वण् देवदास बंजारे स्मृति सम्मान मिले रिहिसेण् वोमन ल मध्यप्रदेश शासन के देवी अहिल्या बाई सम्मान घलो मिले रिहिसे 10 मार्च 2018 म वोमन नश्वर दुनिया ले बिदागरी ले लिए रिहिन हें
सुरूज बाई खाडे के जनम 12 जून 1949 के बिलासपुर जिला के एक ग्रामीण परिवार म होए रिहिसेण् जब वो सात बछर के होइसए तभेच ले अपन बबा ;नानाद्ध रामसाय घृतलहरे के मार्गदर्शन म गाए ले धर लिए रिहिसे वोहर अपन नाना जगा ले भरथरी के संगे.संग ढोला.मारूए चंदैनी जइसन लोक गाथा मनला घलो सीखे रिहिसे…
पहली बेर उनला रतनपुर मेला म गाये के मौका मिले रिहिसेए फेर रूस म सन् 1986.87 म होए श्भारत महोत्सवश् म उनला विशेष चिन्हारी अउ प्रसिद्धि मिलिसण् रूस के छोड़े करीब 18 अउ देश मनमा वोमन अपन कला के डंका बजाए रिहिन हें जेकर सेती उनला दाऊ रामचंद्र देशमुख अउ स्वण् देवदास बंजारे स्मृति सम्मान मिले रिहिसे वोमन ल मध्यप्रदेश शासन के देवी अहिल्या बाई सम्मान घलो मिले रिहिसे 10 मार्च 2018 म वोमन ए नश्वर दुनिया ले बिदागरी ले लिए रिहिन हें
सुरूज बाई खाडे के जनम 12 जून 1949 के बिलासपुर जिला के एक ग्रामीण परिवार म होए रिहिसे जब वो सात बछर के होइसए तभेच ले अपन बबा ;नानाद्ध रामसाय घृतलहरे के मार्गदर्शन म गाए ले धर लिए रिहिसे वोहर अपन नाना जगा ले भरथरी के संगे.संग ढोला.मारूए चंदैनी जइसन लोक गाथा मनला घलो सीखे रिहिसे
पहली बेर उनला रतनपुर मेला म गाये के मौका मिले रिहिसेए फेर रूस म सन् 1986.87 म होए भारत महोत्सव म उनला विशेष चिन्हारी अउ प्रसिद्धि मिलिसण् रूस के छोड़े करीब 18 अउ देश मनमा वोमन अपन कला के डंका बजाए रिहिन हेंण् जेकर सेती उनला दाऊ रामचंद्र देशमुख अउ स्वर्ण देवदास बंजारे स्मृति सम्मान मिले रिहिसेण् वोमन ल मध्यप्रदेश शासन के देवी अहिल्या बाई सम्मान घलो मिले रिहिसेण् 10 मार्च 2018 म वोमन ए नश्वर दुनिया ले बिदागरी ले लिए रिहिन हें
सुरूज बाई खाडे के जनम 12 जून 1949 के बिलासपुर जिला के एक ग्रामीण परिवार म होए रिहिसे जब वो सात बछर के होइसए तभेच ले अपन बबा ;नानाद्ध रामसाय घृतलहरे के मार्गदर्शन म गाए ले धर लिए रिहिसेण् वोहर अपन नाना जगा ले भरथरी के संगे.संग ढोला.मारूए चंदैनी जइसन लोक गाथा मनला घलो सीखे रिहिसे पहली बेर उनला रतनपुर मेला म गाये के मौका मिले रिहिसे फेर रूस म सन् 1986.87 म होए श्भारत महोत्सवश् म उनला विशेष चिन्हारी अउ प्रसिद्धि मिलिस रूस के छोड़े करीब 18 अउ देश मनमा वोमन अपन कला के डंका बजाए रिहिन हेंण् जेकर सेती उनला दाऊ रामचंद्र देशमुख अउ स्वर्ण देवदास बंजारे स्मृति सम्मान मिले रिहिसे वोमन ल मध्यप्रदेश शासन के देवी अहिल्या बाई सम्मान घलो मिले रिहिसेण् 10 मार्च 2018 म वोमन ए नश्वर दुनिया ले बिदागरी ले लिए रिहिन हें
पत्नियों के बर्ताव की वजह से पति का जीवन कैसे बदल गयाए ऐसे वाकयों पर बात करते हुए पहला खयाल तो तुलसीदास का आता है जो एक सांप को रस्सी समझकर उसके सहारे अपनी पत्नी रत्नावली के घर में घुस गए थे। उन्हें अपनी पत्नी से फटकार मिली थी. अस्थि चर्ममय देह यहए तासों ऐसी प्रीत। नेकु जो होती राम सेए तो काहे भव.भीत। पत्नी की इस फटकार का तुलसीदास पर ऐसा असर पड़ा कि वह राम के ही भक्त हो गए। तुलसीदास से बहुत पहले इसी तरह प्राचीन उज्जैन में एक बहुत प्रतापी राजा हुआ करते थेए जिनका नाम था भर्तृहरि। उन दिनों राजाओं की कई.कई पत्नियां हुआ करती थीं। भर्तृहरि की भी कई पत्नियां थीं। लेकिन वह अपनी सबसे छोटी पत्नी पिंगला पर फिदा थे। वह पिंगला के प्रति इतने आसक्त थे कि हमेशा उसे खुश करने के तरीके खोजते रहते थे। पिंगला के प्रेम में वह राजा होने के अपने कर्तव्यों से भी समझौता करने लगे थे।
उन्हीं दिनों उज्जैन में अपने नाम की धूम मचाने वाले तपस्वी गुरु गोरखनाथ का आना हुआ। गोरखनाथ का इतना नाम था कि हर राजा उनके पास आकर आशीर्वाद जरूर लेता था। राजा भर्तृहरि ने भी गोरक्षनाथ को दरबार में बुलवा लिया। दरबार में उन्होंने गोरखनाथ का भरपूर आनंद.सत्कार किया। इस सत्कार से प्रसन्न होकर गोरखनाथ ने राजा को अपने झोले से निकालकर एक खास प्रजाति का फल दिया। फल देते हुए हुए उन्होंने बताया मैं आपको एक चमत्कारी फल दे रहा हूं। यह ऐसा फल है जिसे खाकर आप हमेशा जवान रहेंगेए आपको कभी बुढ़ापा नहीं आएगा। आपकी युवावस्था भी हमेशा बनी रहेगी। राजा को यह चमत्कारी फल देकर गोरखनाथ दूसरे राज्य की ओर चले गए।
वह चमत्कारी फल हाथ में लिए राजा भर्तृहरि अपनी पत्नी पिंगला के बारे में सोचने लगे। राजा अपनी इस पत्नी की सुंदरता और यौवन पर मोहित थेए इसलिए उन्हें सहज ही विचार आया कि मुझे सुंदरता की क्या जरूरत। क्यों न मैं यह फल अपनी पत्नी को ही दे दूं। फल खाने के बाद वह चिरयौवना बनी रहेगी और मैं जीवन भर उसके सौंदर्य का मधुर रस पीते रहूंगा। ऐसा सोचते हुए उन्होंने फल पत्नी को दे दिया। राजा भर्तहरि को मालूम नहीं था कि छोटी रानी का उन पर नहींए बल्कि राज्य के कोतवाल पर दिल आया हुआ था और वह कोतवाल से ही छिप.छिपकर मिला करती थी। यानी रानी की प्रेम लीला कोतवाल के साथ परवान चढ़ रही थी। राजा से वह चमत्कारी फल पाते ही रानी के मन में बात आई कि क्यों न वह इस फल को अपने प्रेमी कोतवाल को दे दे।
फल खाकर वह हमेशा जवान रहेगा और लंबे समय तक उसकी प्रेम पिपासा को तृप्त करता रहेगा। यह सोचकर रानी पिंगला ने वह फल कोतवाल को दे दिया। लेकिन जिस तरह रानी राजा भर्तृहरि को छोड़कर कोतवाल से प्रेम करती थीए वैसे ही कोतवाल रानी से नहींए बल्कि एक जवान वेश्या के प्रेम में गिरफ्तार था। फल हाथ आते ही उसने उसे वेश्या के हवाले कर दिया ताकि वह लंबे समय तक जवान और सुंदर बनी रहे। वेश्या ने फल पाकर सोचा कि यदि वह जवान और सुंदर बनी रहेगीए तो उसे लंबे समय तक वेश्यावृत्ति का यह गंदा काम करते रहना होगा। उसे इस नारकीय जीवन से मुक्ति नहीं मिलेगी। उसने सोचा कि इस फल की सबसे ज्यादा जरूरत तो हमारे राजा को है। राजा अगर बलशाली रहेंगेए हमेशा जवान रहेंगेए तो लंबे समय तकप्रजा को सभी सुख.सुविधाएं मिलती रहेंगी। ऐसा सोचते हुए उसने चमत्कारी फल राजा को दे दिया।
राजा भर्तृहरि ने जब उस फल को देखाए तो उसे पहचानकर हैरान रह गए। यह फल तो उन्होंने अपनी रानी पिंगला को दिया था। उन्होंने तुरंत वेश्या से पूछाए यह फल कहां से मिला तुम्हेंघ् वेश्या राजा के तेवर देख घबरा गई। उसने तुरंत कोतवाल का नाम बता दिया। राजा ने कोतवाल को बुलवा लिया। पहले तो वह इधर.उधर की बातें करना लगा। उसे डर था कि रानी का नाम आते ही राजा बौखला जाएंगेए लेकिन राजा ने सख्ती से पूछताछ की तो उसने भेद खोल दिया।
यह जानने के बाद कि रानी पिंगला ने ही कोतवाल को वह फल दियाए राजा समझ गए कि रानी पिंगला ने उन्हें धोखा दिया हैए उनके प्रेम के साथ खिलवाड़ किया है। रानी की इस बेवफाई से राजा भर्तहरि बुरी तरह टूट गए। इतना ज्यादा टूट गए कि अचानक उनके मन में संसार से ही वैराग्य जाग पड़ा। उन्हें सब अर्थहीन लगने लगा। उन्हें लगा कि सभी एक.दूसरे को बेवकूफ ही बना रहे हैं। अपने.अपने ढंग से सभी अपने भ्रमजालों में उलझे हुए हैं। वैराग्य से भरे मन के साथ उन्होंने अपना संपूर्ण राज्य विक्रमादित्य को सौंप दिया और उज्जैन की एक गुफा में आकर रहने लगे। उस गुफा में भर्तृहरि ने 12 वर्षों तक तपस्या की। उज्जैन में आज भी राजा भर्तहरि की गुफा पर्यटकों के लिए एक दर्शनीय स्थल बनी हुई है। राजा भर्तृहरि ने वैराग्य पर ष्वैराग्य शतकष् नामक ग्रंथ की रचना कीए जिसका विद्वानों के बीच बहुत नाम है। उन्होंने ष्शृंगार शतकष् और नीति शतक नाम के दो अन्य ग्रंथों की भी रचना की। इनमें भर्तृहरि के वैराग्य से उपजे ज्ञान के मोती छिपे हुए हैं। उन्हें अगर एक बेवफा पत्नी न मिलती तो लोग ज्ञान के इन मोतियों से महरूम हो जाते।
बहुत ही खुशी की बात है कि सूरूज के सुरता करते हुए सुरूज ट्रस्ट साहित्यिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था के आयोजक सुश्री दीप्ति ओग्रे ने एक दिवसीय संगोष्ठी सुरूज का कला जीवन एवं भरथरी (भतृहरि) पर एक चिंतन और शोधपरक आयोजन करने का संकल्प लेते हुए छत्तीसगढ़ की जाने माने भरथरी लोक गायिका सूरज बाई खाण्डे जिन्होंने देश ही नहीं बल्कि विश्व के कई देशों में अपना परचम लहराया और बहुत ही ख्यााति अर्जित की है। जिनको हमारे छत्तीसगढ़ के लोग विस्मृत करने लगे थे ऐसे वक्त पर कला, साहित्य और संगीत की परख करने वाली छत्तीसगढ़ की विदुषी कलाकार साहित्यिक संगीत और प्रतिभा की धनी दीप्ति ओग्रे ने इस महत कार्य का बीड़ा उठाते हुए सूरूज के सुरता के तहत् उस महान कलाकार की स्मृति में एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन हमारे छत्तीसगढ़ की उस महान प्रतिभा को सामने लाने का प्रयास करना एक महत्वपूर्ण कार्य है।
इसके लिए मैं दीप्ति ओग्रे को बधाई देना चाहूंगा। मुझे उम्मीद है कि इस संगोष्ठी में अनेक विद्वान साहित्यकार अपनी शोधपूर्ण चिंतन से सुरूज बाई खाण्डे की अनेक पहलुओं को अपने शोध के माध्यम से सामने लाने का प्रयास करेंगे। मैंने भी इसी कड़ी में सुरूज बाई खाण्डे द्वारा राजा भरथरी की गाथा को अपने मधुर स्वर और एक विशेष शैली में प्रस्तुत करने की प्रतिभा और गााथा को सामने लाने का प्रयास किया है। इस शोध पूर्ण आलेख के माध्यम से मैं चाहता हूं कि इन सारे आलेखों का संकलन और संपादन करते हुए एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित का कष्ट करेंगे। ताकि हमारे छत्तीसगढ़ के कला साधकों को अपने इस प्रतिभा पर गर्व हो सके और जान सके की सतनामी प्रतिभा सुरूज बाई खाण्डे एक महान सख्शियत और सतनामी प्रतिभा थी। जिसको एक सतनामी सचेतक प्रतिभा दीप्ति ओग्रे के द्वारा उनको परखने का प्रयास किया और सभी विद्वानों और कलाकारों के समक्ष उन्हें सामने लाने का प्रयास किया। सधन्यवाद सहित………..।


















