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सतनामी समाज का इतिहास एवं सतनाम दर्शन ” एक समीक्षा “

समीक्षक : डॉ. किशन टण्डन क्रान्ति
प्रशासनिक अधिकारी

‘सतनामी समाज का इतिहास एवं सतनाम दर्शन’ डॉ. गुलाबचंद ‘कुसुम’ की द्वितीय प्रकाशित कृति है। यह मई 2024 में सौरभ प्रिंटिंग प्रेस महाल, नागपुर से मुद्रित होकर लोट्स एण्ड कोबरा पब्लिशिंग हाउस लश्करीबाग, नागपुर से प्रथम बार प्रकाशित हुई थी। पुस्तक का आई.एस.बी.एन 978-93-92693- 65-6 है। सर्वाधिकार लेखकाधीन है। इसमें समीक्षा लेखक सहित अनेक साहित्यकारों एवं सामाजिक चिंतकों के सन्देश समाहित हैं।
लेखक ने इस कृति को अपने पूज्य परदादा सतलोकी पंडित हीराराम भारद्वाज को समर्पित करते हुए अपनी जीवन-संगिनी सतलोकी श्रीमती रमन भारद्वाज तथा अपने सतलोकी पिता द्वारिका और सतलोकी माँ सूरज का पुण्य स्मरण भी शामिल किये हैं। कुल 464 पृष्ठ की इस पुस्तक के संकलनकर्ता के रूप में सतलोकी बलदाऊ प्रसाद खाण्डे का नाम अंकित है।
सतनामी समाज का इतिहास एवं सतनाम दर्शन की प्रस्तावना में एक स्थान पर डॉ. गुलाबचंद ‘कुसुम’ लिखते हैं-
सतगुरु घासीदास आए,
सतनामी ज्ञान लखाये।
भटकत हंसा के भ्रम छोड़ाये,
पाखंडवाद से मुक्ति दिलाये।

प्रस्तावना की पंक्तियों से ही स्पष्ट है कि समग्र कृति में गुरु घासीदास और उनके द्वारा दिए गए आडम्बर और असमानता के विरुद्ध सिद्धांतों, सतनाम संदेशों और उपदेशों पर विशद व्याख्या प्रस्तुत की गई है। गुरु घासीदास ने अपने तपोबल से शक्ति प्राप्त कर “मनखे मनखे एक बरोबर” के महान सन्देश देकर समता मूलक समाज की स्थापना हेतु अपना सारा जीवन अर्पित कर दिए थे।

प्रस्तुत पुस्तक की विषय सूची में कुल सात अध्याय हैं। पहला, चौथा, पाँचवाँ, छठवाँ और सातवाँ अध्याय प्रत्येक में 7-7 तथा दूसरा और तीसरा अध्याय में 9-9 उपखण्ड हैं। प्रथम अध्याय में सतनामी समाज के इतिहास तथा जागृति से नारनौल में सतनामियों के प्रमाणित तीन स्थलों का विस्तार से वर्णन है। वे लिखते हैं- “सतनामियों का इतिहास 7-8 हजार वर्ष पुराना है, जो अभी तक प्राप्त जानकारी और तथ्य पर आधारित है। गुरु घासीदास को तारनहार, बंदीछोर और घनघोर गुरु जैसे अनेक नामों से सम्बोधित और विभूषित किया जाता है। कर्नल एग्न्यू ने तो तो उन्हें छत्तीसगढ़ का आश्चर्यजनक मानव कहा है।”
निःसंदेह गुरु घासीदास एक महान मानवतावादी संत थे। वस्तुतः सत्य और मिथ्या तथा सही और गलत के सवालों से जूझती हुई दुनिया में जीने की राह गुरु घासीदास ने बतलाई थी। सत्य ही एक मात्र आधार है, जिस पर कोई भी मजबूत समाज खड़ा हो सकता है। सत्य केवल शब्दों में नहीं, कर्मों में होना चाहिए। इसे लक्ष्य करते हुए गुरु घासीदास ने मानव समाज को सत्य पर आधारित 7 सिद्धांत और 42 अमृतवाणी दिए, जिसे सतनाम धर्मियों का गॉस्पेल कहा जाता है। यह संपूर्ण मानव समाज के लिए आदर्श आचरण संहिता है। कृति लेखक की ये पंक्तियाँ दृष्टव्य है-
सतनाम सत औषधि, गुरु अमृत की खान।
सप्त सिद्धांत 42 वचन, ताको है परमान।।

 

सतनाम दर्शन कहने से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि इसमें ‘सत्- श्वेत- सतनाम’ की विशद व्याख्या समाहित है, जो मनुष्य को जीवन-जगत के चिरन्तन सत्य से अवगत कराएगी। तभी तो डॉ. गुलाबचंद ‘कुसुम’ लिखते हैं-
सत्य वही जो सुख पहुँचाए, पाप जो दुःख न डारे।
सतनाम के सुमिरन कर, मन भवसागर ले तारे।।

बेशक सत्य को हजार तरीकों से कहा जा सकता है, फिर भी उनमें से हर एक सत्य ही होगा। गुरु घासीदास जीवनपर्यन्त सत्य की राह पर न केवल चलते रहे, वरन अपने अनुयायियों को भी सत्य मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किये। इतिहास के पन्ने इसके गवाह हैं। ये पन्ने यह भी गवाही देते हैं कि सतनामी समाज का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है। वे ‘सादा जीवन उच्च विचार’ के हिमायती रहे हैं। कुसुम जी के चिन्तन में डॉ. भीमराव अम्बेडकर के सिद्धांतों की अमिट छाप भी हैं। मसलन :
सोच-सोच तन- मन जलता है,
दिया भीम का खाता हूँ।
इसलिए इतिहास की बातें,
मैं लोगों को बतलाता हूँ।।

कुसुम जी ने गुरु घासीदास के जन्म, जीवन-मिशन, सतनाम आंदोलन और उनके समय की परिस्थितियों पर वृहद प्रकाश डाला है। एक स्थान पर वे लिखते हैं- “गुरु घासीदास जी का जन्म उस समय हुआ, जिस समय भारत भूमि में मानवता मर चुकी थी। उन्होंने छत्तीसगढ़ में सबसे पहले नवजागरण का संदेश दिया।” इसमें कोई दो मत नहीं है कि गुरु घासीदास सामाजिक चेतना के पुरोधा रहे हैं।
लेखक के सामाजिक सरोकारों का दायरा काफी विस्तृत है। परिवर्तन के विविध आयामों के साथ सिमटी अन्य तमाम बातें भी यथार्थ से उपजी हुई प्रतीत होती हैं। उनके चिन्तन अर्थ को गहराई प्रदान करते हैं। उनकी ये पंक्तियाँ इसकी साक्षी हैं-
चार बरन है इस दुनिया में, कौन बड़ा कहलाया है।
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र, सब एक घाट से आया है।।

कुसुम जी ने इतिहास के पन्ने पलटते हुए यह तथ्य भी उजागर किए हैं कि गुरु घासीदास जी ने पेशवाओं के षड्यंत्र को भेदते हुए मेहनतकश लोगों में उम्मीद का उजाला फैलाया था। तभी तो वह एक स्थान पर लिखते हैं- ” गुरु घासीदास ने 1 जनवरी 1841 को पेशवा शासन के प्रतिबंधों को तोड़ते हुए एक विशाल शोभा यात्रा निकलवाने की तैयारी करवाया। इस शोभायात्रा में 50 हाथी, 50 घोड़े, 50 ऊँट और सतनाम पंथ के लाखों सिपाही छत्तीसगढ़ का भ्रमण करते थे।”
लेखक की मंशा है कि एक ऐसा समाज बनाया जाए, जहॉं मनुष्य अपनी काबिलियत के द्वारा ही पहचाने जाएँ, वरना ‘अहम का वहम’ जारी रहेगा। लेखक मौन रहकर खड़ा रहना नहीं चाहते, वरन यथार्थ के पथरीली पथ पर चलने के पक्षधर हैं, जिससे कि वे कष्ट सहकर भी मंजिल तक पहुँचने में कामयाब हो सकें। इस भावना को अभिव्यक्ति देती हुई उनकी ये पंक्तियाँ उल्लेखनीय है- “अगर मनुष्य अपना और अपने परिवार का पालन पोषण कर सकते हैं। इसके सिवा कुछ नहीं कर सकते। नाली के कीड़े भी अपना और परिवार का पेट पाल लेता है। दोनों में अन्तर क्या है?”

वास्तव में यही जागरण का शंखनाद करना है। कुसुम जी ने सतनाम, सतनामी और सतनामियत पर दिल खोलकर लिखा है। उन्होंने जैतखाम की रचना, स्थापना, स्वरूप, महत्व और प्रत्येक के संदेशों पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उन्होंने गुरु घासीदास के सतनाम दर्शन, गुरु परम्परा, सतनाम धामों, गुरु दर्शन मेला के बारे में भी सिलसिलेवार विवरण प्रस्तुत किये हैं। उन्होंने भुजबल महंत साहेब और उनके स्वाभिमान डोला यात्रा के बारे में लिखकर उनके संघर्ष को भी रेखांकित किए हैं।

 

यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि कुसुम जी ने कृति के माध्यम से सतनामी समाज के विविध पक्षों का बहुरंगी चित्रण किया है। साथ ही युगानुरूप हो रहे हलचलों को सुन्दर तरीकों और अनेक दृष्टांतों के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है। इस कृति को पढ़ने से सब कुछ जीवन्त होकर चलचित्र की भाँति मानस पटल पर घूमने लगता है। इसमें मनोवेगों का अद्भुत संचार है। साथ ही पाठक के हृदय को झकझोर कर उसमें समस्याओं के हल को प्रतिस्थापित करने वाली प्राण-शक्ति विद्यमान है।

सतनाम सशक्तिकरण और स्वावलम्बन की वकालत करती हुई इस किताब की शुरुआत में विश्व इतिहास के महान व्यक्तित्वों तथागत बुद्ध, सम्राट अशोक, संत शिरोमणि गुरु घासीदास, डॉ. अम्बेडकर, महात्मा ज्योतिबा फुले, और शिक्षा ज्योति सावित्रीबाई फुले, छत्रपति शाहूजी महाराज और बहुजन नायक मान. काशीराम के फोटो ना होते तो पुस्तक अधूरी लगती।

समग्र रूप से यह कृति एक सशक्त संपादकीय की मांग करती है। ऐसा होने से प्रस्तुतीकरण में सरसता, लयता और सारगर्भिता में अभिवृद्धि होकर शब्दों के उचित प्रयोग से यह एक नई ऊँचाइयों को स्पर्श करने में अधिक सक्षम हुई होती। बावजूद यह कृति वर्तमान परिपेक्ष्य में जागरण की गति को तेज करने में सफल रही है।

दिनांक : 23/06/2025 डॉ. किशन टण्डन क्रान्ति
साहित्य वाचस्पति

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