आलेख

‘बहन से आत्मीय संबंध नहीं, तो कुछ नहीं’ श्री मनोज जायसवाल संपादक सशक्त हस्ताक्षर छ.ग.

– खुन के रिश्ते बहन तो दरकिनार राखी पर पूरी बेशर्मी वाहवाही दिखा रहा। रिश्ते नातों का संसार है। बचपने में भाई बहन के रिश्तों में जिस तरह खेल खेल में लड़ाई झगड़ा,तनातनी और फिर कुछ देर में ही मित्रता…

‘ख़ूबसूरत मोड़ : चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों’ श्री अजय चंन्द्रवंशी सहा.वि. शिक्षा अधिकारी,साहित्यकार कवर्धा छ.ग.

साहित्यकार परिचय- श्री अजय चंन्द्रवंशी माता-पिता – जन्म – 18 मार्च 1978 शिक्षा- एम.ए. हिंदी प्रकाशन –(1) ग़ज़ल संग्रह भूखऔर प्रेम (2011) (2) ज़िंदगी आबाद रहेगी कविता संग्रह(2022) विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कविता, ग़ज़ल, फ़िल्म समीक्षा, इतिहास और आलोचनात्मक आलेख…

‘स्त्रियां घर लौटती है’ श्री अजय चंन्द्रवंशी सहा.वि. शिक्षा अधिकारी,साहित्यकार कवर्धा छ.ग.

साहित्यकार परिचय- श्री अजय चंन्द्रवंशी माता-पिता – जन्म – 18 मार्च 1978 शिक्षा- एम.ए. हिंदी प्रकाशन –(1) ग़ज़ल संग्रह भूखऔर प्रेम (2011) (2) ज़िंदगी आबाद रहेगी कविता संग्रह(2022) विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कविता, ग़ज़ल, फ़िल्म समीक्षा, इतिहास और आलोचनात्मक आलेख…

”सनातन पर्व एवं उसकी प्रासंगिकताएं” श्रीमती आरती जायसवाल साहित्यकार रायबरेली उ.प्र.

साहित्यकार परिचय–  श्रीमती आरती जायसवाल जन्म – बिकई, बम्हनपुर, एन टी पी सी ऊंचाहार रायबरेली, उत्तर प्रदेश माता -पिता –श्रीमती फूलकली श्री कृष्णलाल जायसवाल शिक्षा – स्नातकोत्तर हिन्दी साहित्य (इलाहाबाद विश्वविद्यालय )पी.जी.डी.एन.वाय.डॉ.सी.वी.रमन यूनिवर्सिटी, छत्तीसगढ़ प्रकाशन- प्रथम प्रकाशित कृति- कहानी संग्रह,परिवर्त्तन…

‘सामंजस्यता इनसे सीखने की जरूरत’ मनोज जायसवाल संपादक सशक्त हस्ताक्षर छ.ग.

देश के लोकप्रिय कथावाचकों के आयोजन में कथा श्रवण को पहूंचे उन जिज्ञासु और अपनी समस्या के लिए निदान के इच्छुक श्रोताओं को भरी मंच में खड़े होकर सवाल जवाब करते देखना ही एक तरह से ईश्वर के दर्शन सा…

सबकी नजर बस्तर की ओर

(मनोज जायसवाल) अब उत्कृष्ट क्वालिटी के काजू के लिए भी अपनी पहचान बना रहे बस्तर की ओर लोगों की नजरें सिर्फ सैर की ओर नहीं अपितु यहां मिलने वाली देशी खाद्व वस्तुओं की ओर भी लगी होती है। बारिश के…

बेशर्मी की हद…

(मनोज जायसवाल) कितनों को देखो जो महज कुछ लाइक कमेंट की खातिर कोई कमर हिला रहे हैं तो कोई ठुमका लगा रही है। तो कोई डायलाग के लिए हमेशा तैयार दिखते हैं। बेशर्मी की हद इतनी पार हो चुकी है…

जसगीत बगैर आराधना अधुरी

– निर्मल पानी भवानी मॉं, डाले सगुरिया के हो… (मनोज जायसवाल,कला प्रतिनिधी) छत्तीसगढ़ लोक कला जगत का अतीत जितना पुराना है,संभवतया यहां लोक कला में जसगीत। नवरात्रि पर ओजपूर्ण,कारूणिक रूप से देश की सबसे मीठी छत्तीसगढ़ी में इसके नाम आराधना…

भाव खाने का नहीं भाव रखने का स्वभाव हो…

(मनोज जायसवाल) जीवनचर्या ऐसी हो गयी है कि कई लोगों में न चाहते हुए भी उनमें भाव प्रवेश कर गया है। जिसके चलते उनका स्वभाव ही भाव खाने का हो गया है। जबकि भाव रखने स्वभाव होना चाहिए। अहं रूपी…

इस दिल के तारों से…….

(मनोज जायसवाल) हरी भरी वनस्पतियों के लदी, जंगल में कहीं कोयल की कूक,झरने की झर झर की आवाज,रंग बिरंगे पक्षियों की चहचहाहट देर शाम उल्लू की आवाजें। चाहे फुर्सत के पल हो या कामकाज का समय। उन्हें नहीं लगता कि…

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